नई दिल्ली: सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का अनशन अब सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है। 28 जून से शुरू हुई उनकी भूख हड़ताल को शुरुआती दिनों में सीमित समर्थन मिला, लेकिन कुछ ही दिनों में यह आंदोलन सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक तेजी से फैल गया। अब बड़ी संख्या में लोग इसे शिक्षा व्यवस्था और जवाबदेही से जुड़े व्यापक जनआंदोलन के रूप में देख रहे हैं।
वांगचुक की प्रमुख मांग नीट परीक्षा लीक मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की है। इसी मुद्दे को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर शुरू हुआ उनका आंदोलन लगातार विस्तार लेता गया।
18 जुलाई को जब वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाकर सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, तब प्रदर्शन स्थल पर भीड़ अपेक्षाकृत कम थी। लेकिन इसके बाद आंदोलन को लेकर लोगों की भागीदारी तेजी से बढ़ी।
20 जुलाई को संसद की ओर प्रस्तावित मार्च के दौरान बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पहुंचे। अनुमान के अनुसार, वहां करीब 50 हजार लोग जुटे। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें भी हुईं। इसके बाद से जंतर-मंतर पर लगातार भीड़ बनी हुई है, जबकि वांगचुक फिलहाल मेदांता अस्पताल में भर्ती हैं।
भारतीय राजनीति में कई बार ऐसे आंदोलन उभरे हैं, जिन्हें किसी राजनीतिक दल ने नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति ने गति दी जिसे लोग सत्ता की बजाय त्याग, सादगी और नैतिक प्रतिबद्धता का प्रतीक मानते हैं।
इसी तरह के पैटर्न की चर्चा अब सोनम वांगचुक के आंदोलन को लेकर भी हो रही है। विश्लेषकों का मानना है कि जब कोई गैर-राजनीतिक चेहरा व्यक्तिगत त्याग के साथ किसी सार्वजनिक मुद्दे को उठाता है, तो वह बड़ी संख्या में लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ने में सफल होता है।
भारतीय जनआंदोलनों के इतिहास में महात्मा गांधी को इस परंपरा की सबसे बड़ी मिसाल माना जाता है। उनकी सादगी, सत्याग्रह और अहिंसक संघर्ष ने स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाया।
बाद के वर्षों में जयप्रकाश नारायण ने भी सक्रिय राजनीति से दूरी बनाकर छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया। 1974 का उनका आंदोलन राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मोड़ साबित हुआ और बाद में आपातकाल तथा सत्ता परिवर्तन जैसी घटनाओं की पृष्ठभूमि बना।
2011 में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान अन्ना हजारे का अनशन भी इसी तरह अचानक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया था। जंतर-मंतर और बाद में रामलीला मैदान में हुए उनके अनशन को व्यापक जनसमर्थन मिला।
उस आंदोलन ने तत्कालीन राजनीतिक माहौल को गहराई से प्रभावित किया और आगे चलकर नई राजनीतिक परिस्थितियों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इतिहास में पोट्टी श्रीरामुलु का आमरण अनशन भी एक बड़ा उदाहरण माना जाता है। उन्होंने आंध्र प्रदेश के गठन की मांग को लेकर 1952 में भूख हड़ताल शुरू की थी। उनके निधन के बाद व्यापक जनाक्रोश देखने को मिला और अंततः अलग आंध्र प्रदेश के गठन की घोषणा हुई।
सोनम वांगचुक लगातार यह कहते रहे हैं कि उनकी तुलना महात्मा गांधी से नहीं की जानी चाहिए और उन्हें केवल एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में देखा जाए। हालांकि, सोशल मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में कई लोग उनके आंदोलन की तुलना गांधीवादी परंपरा और पूर्व के बड़े जनआंदोलनों से कर रहे हैं।
पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा, नवाचार और सामाजिक मुद्दों पर लंबे समय से सक्रिय रहने के कारण उनकी सार्वजनिक छवि पहले से मजबूत रही है। ऐसे में उनका वर्तमान अनशन भी व्यापक चर्चा का केंद्र बन गया है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह आंदोलन आने वाले दिनों में किस दिशा में आगे बढ़ता है। क्या यह केवल एक मुद्दे तक सीमित रहेगा या फिर व्यापक जनआंदोलन का रूप लेगा, इसका जवाब आने वाले घटनाक्रम तय करेंगे। इतना तय है कि सोनम वांगचुक का अनशन अब राष्ट्रीय राजनीति और जनभागीदारी की चर्चा के केंद्र में आ चुका है।
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