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हिमाचल प्रदेश में मानसून की तबाही से 157 मौतें और 900 करोड़ का नुकसान! सवालों के घेरे में हिमालयी पर्यावरण

हिमाचल प्रदेश इन दिनों भारी प्राकृतिक आपदाओं के दौर से गुजर रहा है। मानसून के दस्तक देते ही राज्य में बारिश का ऐसा तांडव शुरू हुआ, जिसने हर तरफ तबाही के निशान छोड़ दिए हैं। राज्य से आ रहे आंकड़े बेहद डरावने हैं, जो न सिर्फ बुनियादी ढांचे के तबाह होने की गवाही देते हैं, बल्कि इंसानी जिंदगी पर मंडराते बड़े खतरे की ओर भी इशारा करते हैं।

तबाही के आंकड़े

रिपोर्ट्स के अनुसार, मानसून के इस सीजन में अब तक 157 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। हर दिन सामने आने वाली हादसों की खबरें झकझोर देने वाली हैं। हिमाचल को इस तबाही की वजह से 900 करोड़ रुपये से अधिक का भारी-भरकम नुकसान उठाना पड़ा है।

सड़कों के टूटने, लेंडस्लाइड्स और अचानक आई बाढ़ की वजह से लोक निर्माण विभाग “PWD” और जल शक्ति विभाग को भारी आर्थिक चोट पहुंची है। सैकड़ों सड़कें ब्लॉक हैं, जिससे दूरदराज के इलाकों का संपर्क कट गया है। कई जगहों पर बिजली और पानी की आपूर्ति ठप होने से आम जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है।

क्या इस तबाही के पीछे ‘जलवायु परिवर्तन’ जिम्मेदार है?

इस विनाशकारी स्थिति ने एक बार फिर सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हिमालयी राज्यों में लगातार बढ़ रही ऐसी आपदाएं जलवायु परिवर्तन का परिणाम हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम का चक्र पूरी तरह बदल चुका है। जहां पहले बारिश संतुलित तरीके से होती थी, वहीं अब कुछ ही घंटों में बादल फटने और मूसलाधार बारिश जैसी चरम घटनाएं देखने को मिल रही हैं।

इसके साथ ही, पहाड़ी इलाकों में धड़ल्ले से चल रहे अवैज्ञानिक निर्माण कार्य, जंगलों की कटाई और पहाड़ों की प्राकृतिक बनावट के साथ छेड़छाड़ ने इस संकट को और ज्यादा गंभीर बना दिया है। कमजोर हो चुके पहाड़ जरा सी बारिश भी नहीं झेल पा रहे हैं और मलबे में तब्दील हो रहे हैं।

आगे की राह

हिमाचल प्रदेश में मची यह तबाही सिर्फ एक राज्य का संकट नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। अगर समय रहते पर्यावरण संरक्षण, सस्टेनेबल डेवलपमेंट और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए, तो आने वाले समय में हिमालयी क्षेत्रों का संकट और अधिक भयानक रूप ले सकता है।

news desk

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