नई दिल्ली: सनातन धर्म में पितृ पक्ष को पितरों को समर्पित विशेष समय माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने से पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है। श्राद्ध कर्म में पितरों की तृप्ति के लिए किए जाने वाले विभिन्न कार्यों का विशेष महत्व बताया गया है। आचार्य इंदु प्रकाश के अनुसार, इस दौरान भोजन से लेकर ब्राह्मण भोज और अन्य परंपराओं तक कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए।
मान्यता के अनुसार, श्राद्ध कर्म दोपहर के समय करना चाहिए। इसके लिए अपनी भूमि या किसी पवित्र स्थान का उपयोग किया जा सकता है। श्राद्ध के भोजन में गाय का घी, दूध और दही शामिल करना बेहतर माना गया है। इसके अलावा तुलसी और तिल का प्रयोग भी किया जाता है।
श्राद्ध कर्म में चांदी के बर्तनों का उपयोग और उनका दान करना भी शुभ माना गया है।
श्राद्ध कर्म में ब्राह्मण को भोजन कराने की परंपरा बताई गई है। इसके लिए एक दिन पहले ही ब्राह्मण को भोजन के लिए आमंत्रित करने की बात कही गई है।
पूर्वज के अनुसार ब्राह्मण या ब्राह्मण की पत्नी को आमंत्रित करने की परंपरा बताई गई है। यदि पूर्वज पुरुष हैं तो पुरुष ब्राह्मण और यदि पूर्वज महिला हैं तो ब्राह्मण की पत्नी को भोजन कराने की बात कही गई है। यदि पूर्वज सौभाग्यवती महिला थीं, तो सौभाग्यवती ब्राह्मण की पत्नी को भोजन के लिए आमंत्रित करने की मान्यता है।
भोजन कराते समय ब्राह्मण को आसन पर बैठाना चाहिए। इसके लिए कपड़े, ऊन, कुश या कंबल का आसन इस्तेमाल किया जा सकता है। भोजन परोसते समय दोनों हाथों से परोसने की बात कही गई है। अपनी इच्छा के अनुसार दक्षिणा और वस्त्र भी दिए जा सकते हैं।
श्राद्ध के दिन तैयार किए गए भोजन में से गाय, देवता, कौए, कुत्ते और चींटियों के लिए भी हिस्सा निकालने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार कौए और कुत्ते के लिए निकाला गया भोजन उन्हें ही खिलाना चाहिए, जबकि देवता और चींटियों के निमित्त निकाला गया भोजन गाय को खिलाया जा सकता है।
ब्राह्मण और अन्य पात्रों को भोजन कराने के बाद ही घर के बाकी सदस्यों या परिजनों को भोजन कराने की बात कही गई है।
मान्यता के अनुसार, अगर बहन, जमाई और भांजा उसी नगर में रहते हैं तो उन्हें भी श्राद्ध के दौरान भोजन कराना चाहिए। इसके अलावा श्राद्ध के दिन कोई भिखारी या जरूरतमंद व्यक्ति घर आए तो उसे भी सम्मानपूर्वक भोजन कराने की बात कही गई है।
श्राद्ध के भोजन में जौ, मटर, कांगनी और तिल का उपयोग श्रेष्ठ माना गया है। मान्यता है कि तिल की अधिक मात्रा होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है और तिल श्राद्ध की रक्षा करते हैं। श्राद्ध कर्म में कुशा का भी विशेष महत्व बताया गया है।
नई दिल्ली: जिंदगी और मौत के बीच के अनुभवों को लेकर अक्सर ऐसी कहानियां सामने…
नई दिल्ली: घर में सुख-शांति और सकारात्मक माहौल बनाए रखने के लिए लोग वास्तु के…
नई दिल्ली: 25 साल की उम्र में 1 लाख रुपये महीने की कमाई सुनने में…
मुंबई: मुंबई से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां एक 40 वर्षीय…
नई दिल्ली: आज के समय में हार्ट अटैक के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। खराब…
नई दिल्ली: दिल्ली में कैब से सफर कर रही एक महिला कुछ सामान खरीदने के…