अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने दावा किया था कि कुवैत का वह बेस पूरी तरह ‘किलेबंद’ (Fortified) था और वहां महज एक ड्रोन गलती से पहुंच गया था। लेकिन सैनिकों ने CBS News को दिए इंटरव्यू में इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। सैनिकों के मुताबिक, वहां सुरक्षा के नाम पर सिर्फ एक दीवार थी जो जमीनी जंग में काम आ सकती थी, लेकिन हवाई हमले से बचने के लिए वहां कोई इंतजाम नहीं था।
इंटरव्यू में शामिल 103वीं सस्टेनमेंट कमांड के एक जवान ने बताया कि खुफिया विभाग ने पहले ही आगाह कर दिया था कि ईरान इस बेस को निशाना बना सकता है। इसके बावजूद प्रशासन और कमांडरों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और सैनिकों को खुले मैदान में छोड़ दिया गया।
यह हमला 1 मार्च 2026 को हुआ था। सैनिकों ने बताया कि जब वे सुबह गोला-बारूद का डेटा इकट्ठा कर रहे थे, तभी ईरान के ‘शाहेद’ (Shahed) ड्रोन्स ने ताबड़तोड़ हमला कर दिया।
सैनिकों ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि वे उस दिन ईरान से जंग में हार गए थे। उन्होंने बताया, “ईरानियों ने इसे पूरी योजना के साथ अंजाम दिया था। हम चाहकर भी नहीं बच पाए। ईरानियों के लिए यह एक बड़ी सफलता थी और उस दिन हम बुरी तरह पिट गए थे।”
सैनिकों की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि ट्रंप प्रशासन और रक्षा मंत्रालय ने इस बड़ी क्षति को ‘मामूली नुकसान’ बताकर पेश किया। अपनी पहचान गुप्त रखते हुए इन जवानों ने कहा कि सच्चाई देश के सामने आनी चाहिए कि कैसे उन्हें बिना पर्याप्त हवाई सुरक्षा के खतरे के बीच रखा गया था।
यह हमला तब हुआ था जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या कर दी थी। बदले की कार्रवाई में ईरान ने कुवैत के दक्षिणी छोर पर स्थित इस रणनीतिक बेस को निशाना बनाया था, जो शुरू से ही ईरानी रडार पर था।
सीजफायर के बाद सैनिकों के ये खुलासे ट्रंप प्रशासन के लिए कूटनीतिक और राजनीतिक रूप से बड़ी मुसीबत बन सकते हैं। यह रिपोर्ट दर्शाती है कि युद्ध के दौरान दी गई आधिकारिक जानकारियाँ और जमीनी हकीकत के बीच कितनी बड़ी खाई थी।
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