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क्या सदन में नहीं बोला जा सकेगा ‘जय हिन्द’ और ‘वंदे मातरम्’? सुप्रिया श्रीनेत के दावे से गरमाई राजनीति

“जय हिन्द” और “वंदे मातरम्” जैसे शब्दों का विरोध कौन कर सकता है? आपको यह अजीब लग सकता है, लेकिन कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिय श्रीनेत ने ऐसा दावा किया है.

उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट और साथ में वीडियो साझा करते हुए इस मामले को चर्चा में ला दिया.अपने दावे में उन्होंने कहा कि…ख़बरों के मुताबिक राज्य सभा की बुलेटिन में कहा गया है कि सदन में “जय हिन्द” और “वंदे मातरम्” का प्रयोग नहीं होना चाहिए.

हैरान हूँ. आख़िर इन नारों पर कैसी आपत्ति – इनसे तो अंग्रेज़ों को दिक्कत थी, अब भाजपाईयों को भी है? किस मिट्टी के बने हैं वो लोग जिनको आज़ादी के दो सबसे प्रसिद्ध नारों को सदन में बोलना अखरता है?

इस दौरान उन्होंने “जय हिन्द” और “वंदे मातरम्” के महत्व पर विस्तार से बात की और इन शब्दों के ऐतिहासिक और भावनात्मक अर्थ के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शुरुआत “जय हिन्द” से करते हैं.

उन्होंने कहा कि “जय हिन्द” का मतलब है हिंदुस्तान की जय – भारत की सदैव जय हो. यह स्वतंत्रता संग्राम का सबसे पुरज़ोर नारा है. हर भारतीय के मन में धड़कता है.1907 में इसकी रचना त्रावणकोर, केरल के क्रांतिकारी चेम्पकरामन पिल्लै ने की. 1914-1918 के बीच पिल्लै जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे.

उन्होंने कहा कि विदेश में रह रहे भारतीय क्रांतिकारियों के बीच उन्होंने सबसे पहले “जय हिन्द” का अभिवादन और नारे में प्रयोग किया. 1943-44 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज ने “जय हिन्द” को अपना आधिकारिक अभिवादन और नारा बना कर और भी लोकप्रिय कर दिया. नेताजी अपने सभी भाषणों और साउथ ईस्ट एशिया तथा जर्मनी से प्रसारित रेडियो संदेशों को “जय हिन्द” से समाप्त करते थे.

नेताजी ने इसे इसलिए चुना क्योंकि यह धर्मनिरपेक्ष था और सभी को एकजुट करता था.1947 में स्वतंत्रता के बाद “जय हिन्द” को भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने अपना आधिकारिक अभिवादन और सलामी बनायाआज भी यह सेना, अर्धसैनिक बलों और हर भारतीय में देशभक्ति का जज़्बा भरता है.प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे और भी लोकप्रिय बनाया. वह अपने भाषण अक्सर “जय हिन्द” से समाप्त करते थे.

इसी वीडियो में आगे उन्होंने आगे कहा कि अब बात करते हैं “वंदे मातरम्” की. उन्होंने कहा कि “वन्दे मातरम्” हमारे इतिहास का वो गौरवशाली नारा और गीत है जो भारत को माँ का दर्जा देकर उसका वंदन उसका नमन करता है.

1870 में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने इसे लिखा 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार इसे रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गाया था. उन्होंने आगे कहा कि 1905 में स्वदेशी आन्दोलन में यह जन-जन का राजनीतिक और राष्ट्रवादी नारा बन गया. 1906–1910 ब्रिटिश शासन ने बार-बार प्रतिबन्धित किया, गाने पर गिरफ्तारियाँ हुईं.

स्वराज के लिए प्रदर्शन हो या आज़ादी के लिए जुलूस आज़ादी के महानायकों की ज़ुबान पर हमेशा “वन्दे मातरम्” ही रहता था. भगत सिंह, खुदीराम बोस जैसे क्रान्तिकारियों ने मुकदमे और फाँसी के समय “वन्दे मातरम्” के नारे लगाये.

24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा ने “वन्दे मातरम्” को भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया. अब आप सोचिए इन नारों से किसको समस्या हो सकती है? उन्ही को जिन्होंने आज़ादी के आंदोलन में अपनी छोटी उंगली का छोटा नाख़ून भी नहीं कटाया. जो अंग्रेज़ों की ग़ुलामी और मुखबिरी करते थे.

https://twitter.com/SupriyaShrinate/status/1993908856054010171

news desk

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