इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को होने वाले चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू के सामने पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट समेत विपक्षी नेताओं की चुनौती है। हालिया सर्वेक्षणों में आइजेनकोट की पार्टी को बढ़त मिलती दिखाई दी है, लेकिन किसी भी खेमे को स्पष्ट बहुमत मिलने की तस्वीर सामने नहीं आई है। इजराइल की संसद में सरकार बनाने के लिए 120 में से कम से कम 61 सीटों का समर्थन जरूरी है।
इसलिए किसी पार्टी का सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरना और प्रधानमंत्री पद हासिल करना अलग-अलग बातें हैं। चुनाव के बाद छोटे दलों का समर्थन और गठबंधन की बातचीत भी तय करेगी कि अगली सरकार किसकी बनेगी।
ईरान को इजराइल अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानता है। नेतन्याहू की सरकार ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर लगातार सख्त रुख अपनाया है। हालांकि, सत्ता बदलने पर सैन्य कार्रवाई, कूटनीतिक दबाव और अमेरिका के साथ तालमेल के तरीके में अंतर आ सकता है।
लेकिन विपक्षी खेमे के कई प्रमुख नेता भी ईरान को गंभीर सुरक्षा चुनौती मानते हैं। इसलिए नेतन्याहू की हार को ईरान के साथ तनाव खत्म होने के संकेत के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।
गाजा में युद्ध, वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों का विस्तार और स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश का सवाल इजराइल की राजनीति के सबसे संवेदनशील मुद्दों में शामिल हैं। चुनाव में नेतन्याहू की सरकार को चुनौती देने वाले नेता भी सुरक्षा और हमास के भविष्य को लेकर सख्त रुख रखते हैं।
हालिया चुनावी विश्लेषणों के मुताबिक, प्रमुख उम्मीदवार फिलहाल स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश के गठन के पक्ष में बड़े बदलाव का संकेत नहीं दे रहे हैं। ऐसे में नई सरकार बनने पर कूटनीति, मानवीय सहायता और बस्तियों से जुड़े कुछ फैसलों में बदलाव संभव है, लेकिन फिलिस्तीनियों को तत्काल बड़ी राजनीतिक राहत मिलने की गारंटी नहीं है।
इजराइल में सत्ता परिवर्तन का प्रभाव सिर्फ ईरान और फिलिस्तीन तक सीमित नहीं रहेगा। अमेरिका के साथ संबंध, गाजा के भविष्य पर बातचीत और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था भी इससे प्रभावित हो सकती है। नई सरकार कूटनीतिक प्रयासों को अधिक महत्व दे सकती है, लेकिन उसे देश के भीतर सुरक्षा संबंधी दबावों का सामना भी करना होगा।
दूसरी ओर, अगर नेतन्याहू फिर से सत्ता में लौटते हैं, तो उनकी मौजूदा नीतियों को जारी रखने की संभावना रहेगी। हालांकि, चुनाव के बाद गठबंधन की मजबूती और सहयोगी दलों की शर्तें भी सरकार की दिशा तय करेंगी।
इजराइल का चुनाव सिर्फ नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य का फैसला नहीं है। यह भी तय करेगा कि देश की सुरक्षा नीति और क्षेत्रीय कूटनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी। लेकिन फिलहाल उपलब्ध संकेत यही बताते हैं कि प्रधानमंत्री बदलने से ईरान और फिलिस्तीन पर इजराइल की बुनियादी नीति में तुरंत और पूरी तरह बदलाव होना तय नहीं है।
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