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शिवलिंग पर बेलपत्र उल्टा ही क्यों चढ़ाते हैं? शंख बजाने से क्यों बचते हैं महादेव के भक्त, जानें क्या कहती हैं पौराणिक मान्यताएं

नई दिल्ली: सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। भक्त शिवलिंग पर जल चढ़ाने के साथ बेलपत्र भी अर्पित करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि शिवलिंग पर बेलपत्र अक्सर उल्टा, यानी उसकी चिकनी सतह नीचे की ओर रखकर चढ़ाया जाता है? इसी तरह शिव पूजा में शंख बजाने की परंपरा भी आमतौर पर नहीं है। इन दोनों परंपराओं को लेकर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।

हिंदू धर्म में अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा के लिए विशेष विधि और नियम बताए गए हैं। भगवान शिव की पूजा से जुड़े कई नियम शिव पुराण समेत विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में बताए गए हैं। हालांकि, इन नियमों के पीछे की मान्यताओं से बहुत कम लोग परिचित होते हैं।

शिवलिंग पर बेलपत्र उल्टा चढ़ाने की क्या मान्यता है?

शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते समय उसकी चिकनी सतह को नीचे की ओर और उभरी हुई नसों वाले हिस्से को ऊपर की ओर रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बेलपत्र की चिकनी सतह को सकारात्मक ऊर्जा और स्पंदनों को ग्रहण करने वाला माना जाता है। इसी वजह से इसे शिवलिंग के संपर्क में रखने की परंपरा बताई जाती है।

बेलपत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है। इसके तीन पत्तों को त्रिदेव, त्रिगुण और भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों से जोड़कर भी देखा जाता है। यही कारण है कि शिव पूजा में बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।

बेलपत्र चढ़ाते समय इन बातों का भी रखें ध्यान

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। पूजा में अखंड यानी बिना टूटे या फटे बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा है। बेलपत्र को साफ पानी से धोकर अर्पित करना भी शुभ माना जाता है।

कुछ पूजा पद्धतियों में बेलपत्र की डंडी के सख्त और गांठ जैसे हिस्से को वज्र कहा गया है। ऐसी मान्यता है कि बेलपत्र अर्पित करने से पहले इस हिस्से को अलग कर देना चाहिए।

इसी तरह पत्तियों पर दिखाई देने वाले कुछ सफेद, टेढ़े-मेढ़े या गोल निशानों को चक्र कहा जाता है। कुछ परंपराओं में ऐसे बेलपत्र को दूषित या अशुद्ध मानते हुए शिवलिंग पर अर्पित करने से बचने की बात कही गई है।

शिव पूजा में शंख क्यों नहीं बजाया जाता?

भगवान शिव की पूजा में आमतौर पर शंख बजाने और शंख से जल अर्पित करने की परंपरा नहीं मानी जाती। इसके पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, भगवान शिव ने शंखचूड़ नाम के असुर का वध किया था। ऐसी कथा भी कही जाती है कि शंख की उत्पत्ति शंखचूड़ की हड्डियों से हुई थी। इसी धार्मिक मान्यता के कारण शिव पूजा में शंख का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

एक दूसरी मान्यता के मुताबिक, भगवान शिव हमेशा ध्यान और समाधि में लीन रहते हैं। इसलिए शंख की तेज ध्वनि से उनके ध्यान में व्यवधान न हो, इसी वजह से शिव पूजा में शंख न बजाने की परंपरा मानी जाती है।

विष्णु और लक्ष्मी की पूजा में शंख का क्यों होता है इस्तेमाल?

पौराणिक मान्यताओं में समुद्र मंथन से निकले रत्नों में शंख का भी उल्लेख मिलता है। शंख को भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का प्रिय माना जाता है। यही वजह है कि विष्णु और लक्ष्मी की पूजा में शंख का विशेष महत्व बताया जाता है और पूजा के दौरान इसका इस्तेमाल प्रमुखता से किया जाता है।

शिव पूजा में बेलपत्र चढ़ाने और शंख का इस्तेमाल न करने से जुड़ी ये बातें मुख्य रूप से धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित पूजा परंपराओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों, संप्रदायों और पूजा पद्धतियों में इनके नियम अलग हो सकते हैं।

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