नई दिल्ली: सूर्य ग्रहण को लेकर समाज में सदियों से कई तरह की धार्मिक मान्यताएं चली आ रही हैं। खासतौर पर गर्भवती महिलाओं को ग्रहण के दौरान कई काम न करने की सलाह दी जाती है। उन्हें घर से बाहर निकलने, नुकीली चीजों का इस्तेमाल करने और खाने-पीने से बचने जैसे नियम बताए जाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से गर्भ में पल रहे बच्चे को नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन इन दावों के पीछे धार्मिक विश्वास क्या हैं और विज्ञान इस बारे में क्या कहता है, इसे समझना जरूरी है। 12 अगस्त 2026 को साल का आखिरी सूर्य ग्रहण पड़ रहा है, हालांकि यह भारत में दिखाई नहीं देगा।
सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है, जो तब होती है जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है और कुछ समय के लिए सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक पूरी तरह या आंशिक रूप से नहीं पहुंच पाता। वहीं, हिंदू धर्म और ज्योतिष में ग्रहण को शुभ नहीं माना जाता और इसे राहु-केतु से जोड़कर देखा जाता है।
गर्भवती महिलाओं को लेकर मान्यता है कि ग्रहण के दौरान निकलने वाली नकारात्मक ऊर्जा या हानिकारक किरणें गर्भवती महिला और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को प्रभावित कर सकती हैं। इसी वजह से इस दौरान विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती रही है।
धार्मिक मान्यता में ग्रहण के दौरान गर्भवती महिलाओं के घर से बाहर निकलने पर रोक लगाई जाती है। माना जाता है कि इससे मां और बच्चे पर बुरा असर पड़ सकता है।
हालांकि, वैज्ञानिक दृष्टि से इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि सूर्य ग्रहण के दौरान घर से बाहर निकलने से गर्भवती महिला या उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को नुकसान होता है। सूर्य ग्रहण के दौरान असली वैज्ञानिक सावधानी सूर्य को सीधे नंगी आंखों से देखने को लेकर है। ऐसा करने से आंखों की रेटिना को नुकसान पहुंच सकता है। यदि ग्रहण किसी स्थान से दिखाई दे रहा हो तो उसे देखने के लिए उचित सौर फिल्टर वाले चश्मे या उपकरण का इस्तेमाल करना चाहिए।
धार्मिक मान्यता के अनुसार ग्रहण के दौरान गर्भवती महिला को सुई, चाकू, छुरी और कैंची जैसी नुकीली चीजों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से गर्भ में पल रहे बच्चे के शरीर पर किसी तरह की विकृति हो सकती है।
विज्ञान इस धारणा का समर्थन नहीं करता। बच्चे में जन्मजात विकृतियों के पीछे आनुवंशिक कारण, गर्भावस्था के दौरान पोषण की कमी और अन्य चिकित्सकीय कारण हो सकते हैं। सूर्य ग्रहण और ऐसी विकृतियों के बीच कोई वैज्ञानिक संबंध प्रमाणित नहीं है।
पुराने समय में इस तरह की पाबंदी के पीछे व्यावहारिक वजह भी हो सकती है। उस दौर में बिजली और पर्याप्त रोशनी की सुविधा नहीं थी। ग्रहण के समय अंधेरा होने पर नुकीली चीजों के इस्तेमाल से चोट लगने की आशंका को देखते हुए गर्भवती महिलाओं को ऐसे कामों से दूर रखा जाता रहा हो सकता है।
धार्मिक मान्यता में ग्रहण के दौरान भोजन करने से बचने की सलाह दी जाती है। यह भी कहा जाता है कि ग्रहण के समय तुलसी के पत्ते के बिना रखा भोजन खराब या विषैला हो सकता है।
वैज्ञानिक तौर पर इन दावों का कोई प्रमाण नहीं है। खासकर गर्भवती महिलाओं के लिए लंबे समय तक भूखे रहना या पर्याप्त पानी न पीना उचित नहीं माना जाता। उन्हें अपनी सामान्य गर्भावस्था संबंधी सावधानियों के अनुसार पौष्टिक भोजन, पर्याप्त पानी और आराम का ध्यान रखना चाहिए।
ग्रहण को लेकर डर या तनाव लेने से बचना चाहिए। धार्मिक परंपराओं में मानसिक शांति के लिए मंत्र जाप, योग और ध्यान जैसी गतिविधियों की सलाह दी जाती है। हालांकि, सूर्य ग्रहण के कारण मानसिक तनाव या बेचैनी होने का कोई विशेष वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
गर्भवती महिलाओं के लिए सूर्य ग्रहण के दौरान ऐसी कोई विशेष वैज्ञानिक पाबंदी प्रमाणित नहीं है, जो सामान्य गर्भावस्था की सावधानियों से अलग हो। अगर ग्रहण दिखाई दे रहा हो तो सूर्य को सीधे नंगी आंखों से देखने से बचना चाहिए। यह सावधानी गर्भवती महिलाओं के साथ-साथ हर व्यक्ति के लिए जरूरी है।
12 अगस्त 2026 का सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इसलिए भारत में रहने वाली गर्भवती महिलाओं को ग्रहण को लेकर कोई अतिरिक्त वैज्ञानिक सावधानी बरतने की जरूरत नहीं है। गर्भावस्था के दौरान डॉक्टर की ओर से बताई गई सामान्य सावधानियों का पालन करना ही जरूरी है।
वैज्ञानिक तौर पर ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि सूर्य ग्रहण के दौरान घर से बाहर निकलने से गर्भपात हो सकता है। गर्भावस्था के दौरान महिला को पूरे नौ महीनों में अपनी सेहत, पोषण, आराम और चिकित्सकीय सलाह का ध्यान रखना चाहिए। ग्रहण के नाम पर डर या भ्रम में आकर जरूरी भोजन, पानी या आराम से परहेज करना उचित नहीं है।
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