मुंबई: देशभर में मानसून अब पूरी तरह सक्रिय है, लेकिन इस बार बारिश का पैटर्न मौसम वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा रहा है। एक ओर जून में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई, वहीं दूसरी ओर जुलाई की शुरुआत में मुंबई समेत पश्चिमी भारत के कई हिस्सों में मूसलाधार बारिश ने हालात बिगाड़ दिए। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय मानसून के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसके पीछे अल नीनो और जलवायु परिवर्तन दोनों अहम कारण बन रहे हैं।
जून के दौरान मानसून की रफ्तार धीमी रहने से देश में बारिश की कमी 40 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। हालांकि, महीने के अंत में मानसून के सक्रिय होते ही मुंबई और पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में तेज बारिश का दौर शुरू हो गया, जिससे कई इलाकों में बाढ़ जैसे हालात बन गए।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस समय देशभर में कई मौसम प्रणालियां एक साथ प्रभावी हैं। ओडिशा के ऊपर बना निम्न वायु दबाव क्षेत्र और महाराष्ट्र के ऊपर सक्रिय चक्रवाती परिसंचरण ने मानसून की पूर्वी और पश्चिमी शाखाओं को मजबूती दी है। इसके साथ ही अरब सागर से लगातार मिल रही नमी के कारण महाराष्ट्र में पिछले कई दिनों से भारी बारिश का सिलसिला जारी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अब अल नीनो और जलवायु परिवर्तन को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जा सकता। अल नीनो जहां मानसून के आगमन में देरी और बारिश वाले दिनों की संख्या कम करता है, वहीं जलवायु परिवर्तन बारिश की तीव्रता और विनाशकारी असर को बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग के कारण पश्चिम एशिया में तापमान बढ़ने और अरब सागर की हवाओं में बदलाव का असर भारतीय मानसून पर साफ दिखाई दे रहा है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से बड़ी मात्रा में नमी मिल रही है, जिससे अनुकूल परिस्थितियां बनने पर बेहद कम समय में अत्यधिक बारिश हो रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार जब अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों ओर मौसम प्रणालियां सक्रिय होती हैं, तब भारी मात्रा में नमी पश्चिमी तट तक पहुंचती है। पश्चिमी घाट इन हवाओं को ऊपर उठने के लिए मजबूर करता है, जिससे बादल तेजी से विकसित होते हैं और मुंबई सहित आसपास के इलाकों में अत्यधिक वर्षा होती है।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में मानसून की गतिशीलता में स्पष्ट बदलाव आया है। बंगाल की खाड़ी में बनने वाली मौसम प्रणालियां अब पहले की तरह उत्तर-पश्चिम की बजाय अधिक पश्चिम दिशा की ओर बढ़ रही हैं। इसका असर देश के कई राज्यों में बारिश के वितरण और उसकी तीव्रता पर दिखाई दे रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण मानसून का स्वरूप स्थायी रूप से बदल रहा है। अब चाहे अल नीनो का प्रभाव हो या नहीं, भविष्य में बारिश कम दिनों में लेकिन अधिक तीव्रता के साथ होने की संभावना बढ़ेगी। उत्तर-पश्चिम भारत में भी बारिश के बदलते पैटर्न के पीछे जलवायु परिवर्तन और अरब सागर से बढ़ती नमी को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
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