नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बीच मतदाता सूची में संशोधन और संदिग्ध मतदाताओं (Suspected Voters) को बाहर किए जाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बड़ी टिप्पणी की है। सीजेआई (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत चुनाव नतीजों में तभी दखल देगी, जब हार-जीत का अंतर विवादित वोटों की संख्या से कम होगा।
मुख्य अंश: ‘दो संस्थाओं के बीच पिस रहा है मतदाता’
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पश्चिम बंगाल की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि राज्य का मतदाता दो संवैधानिक संस्थाओं (राज्य सरकार और चुनाव आयोग) के बीच पिस रहा है। कोर्ट ने इसे ‘ब्लेम गेम’ (दोषारोपण) करार देते हुए कहा:
“यह राज्य और चुनाव आयोग के बीच की लड़ाई नहीं है। यह उस मतदाता की गरिमा का सवाल है जो दो संस्थाओं के बीच फंसा हुआ है। सही लक्ष्य तक पहुँचने के लिए तरीका भी सही होना चाहिए।”
चुनाव नतीजों पर अदालत का ‘मैथमेटिकल’ स्टैंड
जस्टिस बागची ने चुनाव परिणामों की वैधता को लेकर एक स्पष्ट पैमाना तय किया। उन्होंने कहा कि अदालत केवल तभी हस्तक्षेप करेगी जब:
यदि चुनाव में जीत का अंतर उन लोगों की संख्या से कम है जिन्हें विशेष गहन संशोधन (SIR) के तहत बाहर किया गया है, तो कोर्ट मामले पर गंभीरता से विचार करेगा।
उदाहरण: जस्टिस बागची के अनुसार, “अगर जीत का अंतर 10% है और वोट न देने वाले (बाहर किए गए) लोग भी 10% हैं, तो चिंता की बात नहीं। लेकिन यदि अंतर 5% से कम है, तो यह गंभीर विषय है।”
क्या है ‘तार्किक विसंगति’ (Logical Inconsistency) का मामला?
मामले की सुनवाई तब गरमा गई जब चुनाव आयोग (EC) ने दलील दी कि न्यायिक अधिकारियों ने ‘तार्किक विसंगति’ के 47 फीसदी मामलों को खारिज कर दिया है। ये वे मामले थे जो चुनाव आयोग द्वारा जारी नोटिसों के आधार पर तय किए गए थे।
अदालत ने इस पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने खुद ही बंगाल में SIR के दौरान संदिग्ध मतदाताओं की एक सूची तैयार की थी, और अब मतदाता भ्रम की स्थिति में हैं।