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वनतारा मामले में SIT ने सुप्रीम कोर्ट में सौंपी अपनी रिपोर्ट. सीलबंद लिफाफे की रिपोर्ट को लेकर अटकलें तेज!

गुजरात के जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज द्वारा स्थापित वनतारा वन्यजीव बचाव केंद्र एक बार फिर चर्चा में है. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित SIT ने 12 सितंबर को अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में कोर्ट को सौंप दी है. इससे पहले 25 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जज जे. चेलमेश्वर की अध्यक्षता में एक विशेष जांच दल (SIT) गठित किया था. SIT ने वनतारा का तीन दिवसीय निरीक्षण किया और अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंप दी.

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 3 मार्च 2025 को उद्घाटन किए गए इस प्रोजेक्ट पर आरोप है कि इसके लिए आदिवासी जमीन का अधिग्रहण फॉरेस्ट राइट्स एक्ट (FRA) के प्रावधानों को दरकिनार करके किया गया. देवगढ़ा और आसपास के जंगलों में रहने वाला सिदी आदिवासी समुदाय दावा करता है कि यह जमीन उनकी पारंपरिक आजीविका का हिस्सा रही है. समुदाय का आरोप है कि प्रोजेक्ट के लिए जमीन का अधिग्रहण ग्राम सभाओं की सहमति के बिना किया गया, जबकि FRA, 2006 की धारा 3 इसके लिए अनिवार्य करती है.

क्या है वनतारा?

रिलायंस फाउंडेशन की पहल पर 2024 में शुरू हुआ वंतारा 3,000 एकड़ में फैला दुनिया का सबसे बड़ा निजी वन्यजीव बचाव केंद्र बताया जाता है. यहां करीब 1.5 लाख जानवरों को शरण दी गई है, जिनमें हाथी, गैंडे, तेंदुए और दुर्लभ प्रजातियां शामिल हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे “भारत की पारंपरिक भावना का प्रतीक” बताया था.

कानूनी पहलू और पूर्व उदाहरण

सुप्रीम कोर्ट 2013 में ओडिशा के नियामगिरी मामले में आदिवासियों के पक्ष में फैसला दे चुका है. सिदी समुदाय का कहना है कि वनतारा में भी वही हालात हैं. FRA क्लेम्स को नज़रअंदाज़ कर मंजूरी दी गई. रिपोर्ट्स के अनुसार, 2021 में वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट में हुए संशोधन से जानवरों के इंटर-स्टेट ट्रांसफर को आसान बनाया गया, जिससे इस प्रोजेक्ट को लाभ मिला.

अदालत में जंग

सिदी ट्राइबल एसोसिएशन और कई NGOs ने सुप्रीम कोर्ट और गुजरात हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की हैं. उनका कहना है कि FRA का उल्लंघन हुआ और ग्राम सभा की अनुमति नहीं ली गई. वहीं इस मामले में रिलायंस इंडस्ट्रीज का कहना है कि जमीन कानूनी तरीके से ली गई और यह प्रोजेक्ट “पब्लिक गुड” है.

व्यापक असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ जमीन विवाद तक सीमित नहीं है. इससे पर्यावरण, स्थानीय आजीविका और कॉर्पोरेट-सरकारी संबंधों पर भी गहरा असर पड़ेगा. फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में है. यदि प्रोजेक्ट को वैधता मिलती है, तो यह आदिवासी भूमि पर अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए भी मिसाल बन सकता है. और अगर वनतारा को वैधता नहीं मिलती तो ये फैसला एक ऐतिहासिक नजीर बनेगा.

news desk

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