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खट से स्कैन, फट से पेमेंट! 10 साल का हुआ UPI, जानिए कैसे चंद सेकेंड में बैंक से बैंक पहुंचता है पैसा

नई दिल्ली: मोबाइल से क्यूआर कोड स्कैन किया, यूपीआई पिन डाला और कुछ ही सेकेंड में पेमेंट पूरा। आज यह प्रक्रिया इतनी आम हो चुकी है कि शायद ही कोई इसके पीछे काम करने वाली तकनीक के बारे में सोचता हो। भारत का यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI अब 10 साल का हो चुका है और इस दौरान यह दुनिया के सबसे बड़े रियल टाइम पेमेंट सिस्टम में शामिल हो गया है। रोजाना करीब 66 करोड़ पेमेंट और हर महीने 29.88 लाख करोड़ रुपये के लेनदेन वाले इस सिस्टम का इस्तेमाल अब भारत के अलावा 11 देशों में भी हो रहा है।

क्या है UPI और कैसे बदली इसने पेमेंट की तस्वीर?

UPI एक ऐसा रियल टाइम भुगतान सिस्टम है, जिसके जरिए मोबाइल फोन से कुछ ही सेकेंड में पैसे भेजे या हासिल किए जा सकते हैं। इसे 2016 में नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने विकसित किया था।

इसकी मदद से बैंक खाते में सीधे पैसे भेजने के लिए लंबा बैंक खाता नंबर या आईएफएससी कोड याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती। मोबाइल नंबर, यूपीआई आईडी या क्यूआर कोड के जरिए भी भुगतान किया जा सकता है। यही वजह है कि डिजिटल पेमेंट आम लोगों के लिए पहले के मुकाबले काफी आसान हो गया।

UPI का विचार क्यों आया, जब कार्ड और नेटबैंकिंग पहले से थे?

UPI आने से पहले भी डिजिटल भुगतान के कई विकल्प मौजूद थे। नेटबैंकिंग के जरिए किसी नए व्यक्ति को पैसे भेजने के लिए पहले लाभार्थी को जोड़ना पड़ता था। इसके लिए बैंक खाता नंबर और आईएफएससी जैसी जानकारियां जरूरी होती थीं और प्रक्रिया पूरी होने में समय लग सकता था।

कार्ड से भुगतान करने के लिए क्रेडिट या डेबिट कार्ड की जरूरत होती थी। कार्ड से जुड़े फ्रॉड और कार्ड क्लोनिंग जैसी चिंताएं भी सामने आती रही थीं। ऐसे में एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत महसूस हुई, जिसमें मोबाइल को ही आसान डिजिटल पहचान बनाकर बैंक खाते से जोड़ा जा सके।

यहीं से यूपीआई जैसी व्यवस्था की जरूरत मजबूत हुई। वर्चुअल पहचान के जरिए बैंक खाते से भुगतान को जोड़कर इसे ज्यादा सरल बनाया गया।

आखिर UPI से पैसा चंद सेकेंड में कैसे पहुंच जाता है?

आप जब किसी क्यूआर कोड को स्कैन करके भुगतान करते हैं या यूपीआई आईडी पर पैसा भेजते हैं, तो इसके पीछे कई तकनीकी प्रक्रियाएं एक साथ काम करती हैं। यूपीआई की भुगतान व्यवस्था तत्काल भुगतान सेवा यानी IMPS तकनीक पर आधारित है।

सबसे पहले यूपीआई सुविधा देने वाला कोई ऐप मोबाइल में इंस्टॉल करना होता है। इसके बाद बैंक खाते को ऐप से जोड़कर जरूरी सत्यापन पूरा किया जाता है और यूपीआई आईडी बनाई जाती है।

जब आप किसी को भुगतान करते हैं तो सामने वाले की यूपीआई आईडी, मोबाइल नंबर, बैंक खाते या क्यूआर कोड के जरिए भुगतान का अनुरोध शुरू होता है। यूपीआई नेटवर्क इस अनुरोध को संबंधित बैंकों के बीच आगे बढ़ाता है। बैंक खाते की पुष्टि और यूपीआई पिन के सत्यापन के बाद रकम भेजने वाले खाते से निकलकर पाने वाले खाते में पहुंच जाती है।

इसी पूरी प्रक्रिया की वजह से भुगतान कुछ ही सेकेंड में पूरा हो जाता है और दोनों पक्षों को लेनदेन की जानकारी मिल जाती है।

UPI का पहला पेमेंट किसने किया था?

भारत में UPI के पहले लेनदेन से जुड़ी तारीख 11 अप्रैल 2016 है। उस दिन भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने NPCI के तत्कालीन प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी को 5,000 रुपये का पहला UPI भुगतान किया था।

इसके कुछ महीने बाद अगस्त 2016 में UPI को आधिकारिक तौर पर लॉन्च किया गया। इसके बाद धीरे-धीरे बैंकों और भुगतान ऐप्स के जुड़ने के साथ इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ता गया।

अब 11 देशों तक पहुंच चुका है UPI

भारत में लोकप्रिय होने के बाद UPI का विस्तार दूसरे देशों में भी हुआ है। फिलहाल दिए गए आंकड़ों के मुताबिक संयुक्त अरब अमीरात, फ्रांस, भूटान, श्रीलंका, नेपाल, सिंगापुर, मॉरीशस, कतर, कंबोडिया, ग्रीस और मालदीव में भी यूपीआई भुगतान की सुविधा उपलब्ध है।

यानी जिस डिजिटल भुगतान व्यवस्था की शुरुआत भारत में आसान और तेज लेनदेन के उद्देश्य से हुई थी, वह अब देश की सीमाओं से बाहर भी अपनी पहचान बना चुकी है।

vineet verma

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