Donald Trump के हालिया चीन दौरे से ज्यादा चर्चा उनके साथ गए अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की सख्त सुरक्षा तैयारियों की हो रही है। इस बार फोकस सिर्फ कूटनीति पर नहीं, बल्कि डिजिटल सुरक्षा पर भी साफ नजर आया।
‘नो पर्सनल डिवाइस’ पॉलिसी क्यों?
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों को आशंका है कि चीन में उनके इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस निगरानी के दायरे में आ सकते हैं। इसी वजह से डेलिगेशन के सदस्यों को अपने निजी फोन और लैपटॉप साथ ले जाने से मना किया गया।
उनकी जगह उन्हें बिल्कुल नए, अस्थायी (टेम्परेरी) डिवाइस दिए गए—जिनमें कोई पुराना डेटा, कॉन्टैक्ट या संवेदनशील जानकारी मौजूद नहीं है। इनका इस्तेमाल केवल सीमित और जरूरी बातचीत तक ही रखा गया।
इस्तेमाल के बाद खत्म कर दिए जाएंगे डिवाइस
इस दौरे की सबसे खास बात यह है कि इन गैजेट्स को वापसी के बाद या तो पूरी तरह फॉर्मेट कर दिया जाएगा या नष्ट कर दिया जाएगा। इसका मकसद किसी भी संभावित साइबर खतरे या वायरस को अमेरिकी सिस्टम तक पहुंचने से रोकना है।
साथ ही अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे अनजान USB या बाहरी डिवाइस का इस्तेमाल बिल्कुल न करें।
कूटनीति के साथ ‘साइबर सतर्कता’
करीब 9 साल बाद Donald Trump का यह चीन दौरा कई मायनों में अहम माना जा रहा है। Xi Jinping के साथ बीजिंग में हुई मुलाकात में व्यापार, ताइवान, और वैश्विक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
लेकिन इस बार असली संदेश यह भी रहा कि आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में साइबर सिक्योरिटी कितनी बड़ी प्राथमिकता बन चुकी है।
इस पूरी घटना को सिर्फ “जासूसी का डर” कहकर देखना अधूरा होगा। असल में यह दिखाता है कि अब देशों के बीच भरोसे की कमी सिर्फ जमीन या राजनीति तक सीमित नहीं रही—यह डिजिटल दुनिया तक गहराई से पहुंच चुकी है।
ट्रंप का यह दौरा केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि “डिजिटल डिप्लोमेसी और साइबर सतर्कता” का भी उदाहरण बन गया है—जहां बातचीत के साथ-साथ डेटा की सुरक्षा भी उतनी ही अहम हो गई है।