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अदालत की चेतावनी के बावजूद नहीं सुधरे ट्रंप, 10% से बढ़ाकर 15%  किया ग्लोबल टैरिफ, कोर्ट के फैसले को बताया ‘अमेरिका-विरोधी’

वॉशिंगटन:  वॉशिंगटन से आई इस खबर ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि डोनाल्ड ट्रंप एक जिद्दी और लोकतंत्र को ठेंगा दिखाने वाले नेता हैं। 20 फरवरी 2026 को Supreme Court of the United States ने 6-3 के बहुमत से साफ कर दिया कि IEEPA 1977 के तहत राष्ट्रपति को इतनी व्यापक आपातकालीन शक्ति नहीं दी जा सकती कि वे मनचाहे टैरिफ लगा दें। अदालत ने दो टूक कहा कि टैरिफ लगाने का अधिकार कांग्रेस के पास है और कार्यपालिका इस सीमा को पार नहीं कर सकती। इसे ट्रंप की पिछली व्यापार नीतियों के लिए बड़ा झटका माना गया।

लेकिन फैसले के कुछ ही घंटों बाद ट्रंप ने नया रास्ता निकाल लिया। ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 का सहारा लेते हुए पहले 10% टैरिफ लगाया गया, जिसे 24 फरवरी से लागू होना था और 150 दिनों तक सीमित बताया गया। कुछ जरूरी वस्तुओं—जैसे महत्वपूर्ण खनिज, दवाइयां, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऊर्जा—को छूट दी गई। अगले ही दिन 21 फरवरी को ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर पोस्ट कर टैरिफ को बढ़ाकर 15% करने की घोषणा कर दी और इसे “पूरी तरह वैध” बताया, जबकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को “अमेरिका-विरोधी” करार दिया।

अदालत बनाम व्हाइट हाउस: टकराव तेज

भारतीय-अमेरिकी वरिष्ठ वकील Neal Katyal ने इस कदम की कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि अगर टैरिफ इतना जरूरी है तो राष्ट्रपति को संविधान का सम्मान करते हुए कांग्रेस से मंजूरी लेनी चाहिए। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अमेरिकी न्याय विभाग पहले खुद कोर्ट में कह चुका है कि धारा 122 व्यापार घाटे (trade deficit) पर सीधे लागू नहीं होती, क्योंकि वह भुगतान संतुलन घाटे से अलग है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम वैश्विक बाजारों में नई अनिश्चितता ला सकता है। महंगाई बढ़ने की आशंका है और अंत में इसका बोझ आम अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। पहले के IEEPA टैरिफ से 160-175 अरब डॉलर की वसूली हुई थी, जिसकी वापसी की मांग भी उठ रही है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या ट्रंप की आक्रामक ट्रेड रणनीति सच में अमेरिका को मजबूत करेगी, या फिर यह एक नए व्यापार युद्ध की शुरुआत साबित होगी। फिलहाल इतना तय है कि व्हाइट हाउस और अदालत के बीच यह टकराव अभी थमता नजर नहीं आ रहा।

news desk

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