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बकरीद पर ‘कुर्बानी’ तो हुई, लेकिन छुरी बकरे पर नहीं…आगरा के इस मुस्लिम परिवार ने बकरीद पर जो किया, उसने सबको चौंका दिया!

आज कल सोशल मीडिया पर रोज़ हज़ारों वीडियो वायरल होते हैं, लेकिन कुछ खबरें ऐसी होती हैं जो सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि समाज को एक गहरा संदेश दे जाती हैं। ऐसी ही एक बेहद दिलचस्प और अनोखी खबर उत्तर प्रदेश के शहर आगरा से सामने आई है, जिसने इस बार की बकरीद (ईद-उल-अज़हा) पर सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

यहाँ के एक मुस्लिम परिवार ने सदियों पुरानी परंपरा को एक नए, संवेदनशील और आधुनिक नज़रिए से मनाकर इंटरनेट पर एक नई बहस छेड़ दी है।

क्या है पूरा मामला?


आगरा के शाहगंज में तिरंगा मंजिल, शेरवानी मार्ग के रहने वाले पेशे से वकील गुल चमन शेरवानी और उनके परिवार ने इस साल बकरीद को बिल्कुल अलग अंदाज में मनाया। अमूमन इस त्योहार पर बकरे या अन्य मवेशियों की कुर्बानी देने की प्रथा है, लेकिन शेरवानी परिवार ने इस बार किसी जीव की जान लेने के बजाय बकरे की तस्वीर वाला एक बड़ा सा केक काटा।

इस अनोखे ‘केक-कटिंग सेलिब्रेशन’ की तस्वीरें और वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर आए, यह खबर तुरंत तेज़ी वायरल हो गई।

दिखावे पर चोट और जीवों के प्रति दया


गुल चमन शेरवानी और उनके परिवार का यह कदम सिर्फ एक अलग तरीका नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक बहुत ही सुलझी हुई और गहरी सोच थी, परिवार का मुख्य उद्देश्य समाज को यह संदेश देना था कि हमें बेजुबान जानवरों के प्रति दया और करुणा का भाव रखना चाहिए।
गुल चमन शेरवानी का मानना है कि अल्लाह कभी भी सिर्फ खून या मांस की कुर्बानी नहीं मांगता, बल्कि वह इंसान की ‘नीयत’ देखता है। आज के दौर में बहुत से लोग कुर्बानी के नाम पर महंगे से महंगा बकरा खरीदकर अपनी दौलत का प्रदर्शन करते हैं। इस परिवार ने इसी दिखावे का पुरजोर विरोध किया है।

परिवार के मुताबिक, सच्ची कुर्बानी वो है जब इंसान अपने अंदर के लालच, नफ़रत, अहंकार और बुराइयों को त्यागे। जानवरों की जान लेने से ज़्यादा ज़रूरी खुद को एक बेहतर इंसान बनाना है। इस मौके पर उन्होंने समाज से नफ़रत की दीवारों को गिराकर आपसी प्रेम, सौहार्द और मानवता को बढ़ावा देने की भी अपील की।

इस अनोखी घटना ने सोशल मीडिया और इंटरनेट की दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया है,जिससे यह विषय चर्चा का एक बड़ा केंद्र बन गया है।


एक तरफ जहाँ प्रगतिशील सोच रखने वाले लोग इस कदम की जमकर तारीफ कर रहे हैं, वहीं उनका मानना है कि बदलते दौर के साथ परंपराओं को पर्यावरण और जीव-जंतुओं के अनुकूल ढालना बेहद ज़रूरी है। ऐसे प्रशंसकों का कहना है कि आगरा के इस परिवार ने बेजुबान जानवरों के प्रति दया दिखाकर समाज के सामने एक बेहद खूबसूरत और आधुनिक मिसाल पेश की है, जो रूढ़िवादिता को तोड़ती है।

दूसरी तरफ, परंपरावादी विचारधारा के लोग इस कदम से पूरी तरह असहमत नज़र आ रहे हैं। उनका तर्क है कि धार्मिक रीतियों और सदियों से चली आ रही रवायतों का अपना एक विशेष महत्व होता है, जिन्हें उनके मूल रूप में ही निभाया जाना चाहिए। इस तबके के लोगों का कहना है कि त्योहारों की अपनी मर्यादा होती है और बकरे की तस्वीर वाला केक काटना, पारंपरिक रूप से दी जाने वाली कुर्बानी का विकल्प या उसका सही तरीका बिल्कुल नहीं हो सकता।

news desk

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