ईरान को लेकर अमेरिका लगातार सख्त बयान और धमकियां दे रहा है। वॉशिंगटन की रणनीति स्पष्ट मानी जा रही है—ईरान की मौजूदा सरकार को कमजोर कर वहां अपने अनुकूल सत्ता व्यवस्था स्थापित करना। हालांकि, हालिया घटनाक्रम ने अमेरिकी मंसूबों को बड़ा झटका दिया है।
ईरान में हाल के दिनों में हुए प्रदर्शनों के दौरान कुछ जगहों पर हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं। कई स्थानों पर मस्जिदों और इमाम बारगाहों को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं ने ईरानी समाज को झकझोर दिया। शिया बहुल देश में धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने से आम जनता के बीच यह सवाल उठने लगा कि क्या यह विरोध वास्तव में जनता की भावनाओं से जुड़ा है या इसके पीछे कोई और एजेंडा काम कर रहा है।
ईरान की राजनीति को करीब से देखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि इन घटनाओं ने आम लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। बड़ी संख्या में लोग यह मानने लगे कि कोई भी सच्चा मुस्लिम मस्जिदों और इमाम बारगाहों को नुकसान नहीं पहुंचा सकता। यही संदेश ईरान के सर्वोच्च नेता की ओर से भी इशारों में दिया गया, जिसके बाद सरकार के समर्थन में लोग सड़कों पर उतर आए।
प्रदर्शनकारियों के खिलाफ उतरे लोगों का कहना है कि उन्हें अपनी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से नाराजगी हो सकती है, लेकिन वे देश की सरकार को गिराने या विदेशी दखल को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं करेंगे। “हम अपने देश से नाराज हो सकते हैं, लेकिन देश के खिलाफ नहीं यह भावना खुलकर सामने आई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यहीं से अमेरिका और इज़रायल की रणनीति कमजोर पड़ती नजर आ रही है। अब आशंका जताई जा रही है कि वॉशिंगटन सैन्य विकल्प पर गंभीरता से विचार कर सकता है। हालांकि, यह रास्ता अमेरिका के लिए बेहद जोखिम भरा साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान कोई वेनेजुएला नहीं है। उसका सुरक्षा ढांचा बेहद मजबूत, संगठित और वैचारिक रूप से गहराई से जुड़ा हुआ है। ईरान की सत्ता केवल एक सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक व्यापक सैन्य और वैचारिक संरचना पर आधारित है, जिसे बाहरी दबाव से तोड़ना आसान नहीं।
ईरान की इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को दुनिया की सबसे प्रभावशाली सैन्य ताकतों में गिना जाता है। इसमें डेढ़ लाख से अधिक प्रशिक्षित जवान हैं। इसके पास अपनी एयरफोर्स, नेवी, मिसाइल यूनिट और अत्याधुनिक साइबर आर्मी मौजूद है, जो किसी भी हमले का जवाब देने में सक्षम मानी जाती है।
ईरान मामलों के जानकारों का कहना है कि यदि अमेरिका किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई करता है, तो ईरान पलटवार करने से पीछे नहीं हटेगा। ऐसे में अमेरिकी सैन्य ठिकानों के साथ-साथ इज़रायल के कई शहर भी ईरान के निशाने पर आ सकते हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक, अमेरिका का एक गलत कदम उसके लिए भारी पड़ सकता है, क्योंकि इस समय ईरान में राष्ट्रवादी भावना मजबूत होती दिख रही है और जनता बड़े पैमाने पर सरकार के साथ खड़ी है। यह माहौल अमेरिका और इज़रायल की रणनीति को पूरी तरह नाकाम कर सकता है।
इसके अलावा, यदि अमेरिका इस संघर्ष में उतरता है तो ईरान उसे एक लंबी और थकाऊ जंग में फंसा सकता है, जो न केवल अमेरिका बल्कि डोनाल्ड ट्रंप के लिए भी राजनीतिक रूप से घातक साबित हो सकती है।
ईरान विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अमेरिका के भीतर ही ट्रंप के खिलाफ विरोध बढ़ रहा है। यदि ईरान पर हमला किया गया, तो अमेरिकी जनता और सेना दोनों के बीच नाराजगी और बढ़ सकती है, क्योंकि अमेरिका पहले ही कई युद्धों का बोझ झेल चुका है।
ऐसे में भले ही ट्रंप प्रशासन सख्त रुख अपनाए हुए हो, लेकिन ईरान पर सीधी सैन्य कार्रवाई करना अमेरिका के लिए आसान नहीं होने वाला।
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