अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं और हमले की धमकी दे रहे हैं। ट्रंप चाहते हैं कि परमाणु समझौता जल्दी हो जाए, लेकिन अगर समझौता नहीं हुआ तो ईरान को बर्बाद करने की चेतावनी भी दे रहे हैं।अमेरिका की ओर से संभावित सैन्य कार्रवाई की अटकलें लगाई जा रही हैं, लेकिन साथ ही कूटनीतिक समाधान की कोशिशों की भी बात कही जा रही है।
ईरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी दबाव में झुकने वाला नहीं है। बातचीत जरूर हुई और माहौल को ‘अच्छी शुरुआत’ बताया गया, लेकिन ईरान ने अपनी लाल रेखा खींच दी है।
परमाणु मुद्दे के अलावा वह किसी अन्य विषय पर चर्चा के लिए तैयार नहीं है। न उसके मिसाइल कार्यक्रम पर, न क्षेत्रीय गुटों के समर्थन पर और न ही इज़रायल से जुड़ी चिंताओं पर। इन सभी सवालों पर ईरान का जवाब एक ही है-ये बातचीत के दायरे में नहीं आते। इसी सख्त रुख के चलते इज़रायल की बेचैनी बढ़ गई है।
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित जंग को टालने के लिए कूटनीतिक स्तर पर कोशिशें तेज हैं, लेकिन ज़मीन पर हालात अब भी तनावपूर्ण बने हुए हैं।
जिनेवा में जारी बातचीत के बावजूद दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी साफ नजर आ रही है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि वार्ता सही दिशा में आगे बढ़ रही है या नहीं, क्योंकि दोनों पक्ष अलग-अलग दावे कर रहे हैं।
उधर ईरान ने मंगलवार को कहा कि वह अमेरिका के साथ समझौते के लिए “मार्गदर्शक सिद्धांतों” पर सहमत हुआ है, जिससे टकराव की स्थिति को टाला जा सके। वहीं दूसरी ओर अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ किया कि ईरान ने अब तक अमेरिका की सभी “रेड लाइन” स्वीकार नहीं की हैं। उनके मुताबिक कुछ अहम मुद्दों पर अब भी सहमति नहीं बन पाई है।
कूटनीतिक बातचीत के समानांतर सैन्य शक्ति का प्रदर्शन भी जारी है। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी सेना ने मध्य पूर्व में F-22, F-35 और F-16 जैसे 50 से अधिक अत्याधुनिक लड़ाकू विमान तैनात कर दिए हैं। इसके जवाब में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने चेतावनी दी है कि जरूरत पड़ने पर वे मध्य पूर्व में मौजूद अमेरिकी युद्धपोतों को निशाना बना सकते हैं।
कुल मिलाकर, बातचीत जारी है लेकिन बयानबाज़ी और सैन्य तैनाती ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है। अब दुनिया की निगाहें इस पर टिकी हैं कि कूटनीति बाज़ी मारेगी या टकराव की आशंका और गहराएगी।