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अमेरिका में गूंजा ‘सिंदूर खेला’ और ‘गोलू’ का नाम! जानिए न्यूयॉर्क के मेयर के नवरात्रि संदेश ने क्यों चौंकाया?

नवरात्रि का त्योहार आते ही आमतौर पर हर तरफ सिर्फ गरबा और डांडिया की धूम की बातें होने लगती हैं। लेकिन इस बार समंदर पार अमरीका के न्यूयॉर्क से आए एक बधाई संदेश ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। न्यूयॉर्क के मेयर ने अपने आधिकारिक नवरात्रि शुभकामना संदेश में गरबा के साथ-साथ ‘सिंदूर खेला’ और ‘गोलू’ (बोम्माई कोलू) का नाम लेकर सभी को चौंका दिया। भारत से हजारों मील दूर किसी विदेशी मंच पर इन दोनों समृद्ध परंपराओं का एक साथ जिक्र आना कोई आम बात नहीं है, क्योंकि ये दोनों रस्में देश के दो अलग-अलग कोनों—पूर्वी भारत और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिनिधित्व करती हैं।

माँ दुर्गा की विदाई और सुहाग का उल्लास

लाल पाड़ की सफेद साड़ी और गालों पर लगा गाढ़ा लाल सिंदूर—विजयादशमी के दिन बंगाल या पूर्वी भारत के किसी भी पूजा पंडाल का दृश्य दिल को छू लेने वाला होता है। बंगाली समाज में ‘सिंदूर खेला’ महज एक रस्म भर नहीं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक अहसास है। यहाँ माँ दुर्गा को केवल एक शक्तिस्वरूप देवी ही नहीं, बल्कि अपने मायके आई बेटी के रूप में देखा जाता है।

विजयादशमी के दिन माँ दुर्गा की विदाई के वक्त सुहागन महिलाएं पहले माँ की मांग भरती हैं, उन्हें मीठा पान और ‘संदेश’ (मिठाई) का भोग लगाती हैं। इसके बाद वे एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सदा सुहागन रहने की शुभकामनाएं देती हैं। ढोल-ढाक की थाप और नाच-गाने के बीच बेटी के अपने ससुराल लौटने की टीस और आँखों में विदाई के आँसू इस पर्व को एक भावुक और अमूल्य अनुभव बना देते हैं।

बिना किताबों के संस्कार सिखाने की कला ‘गोलू‘

दूसरी ओर, दक्षिण भारत के तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में नवरात्रि का रंग बिल्कुल अनोखा और सांस्कृतिक होता है। यहाँ त्योहार की मुख्य पहचान ‘गोलू’ या ‘बोम्माई कोलू’ से होती है। इस परंपरा में घरों के भीतर लकड़ी के तख्तों से सीढ़ियाँ बनाई जाती हैं और उन पर देवी-देवताओं, साधु-संतों, राजा-रानियों तथा आम जनजीवन से जुड़ी मिट्टी और लकड़ी की खूबसूरत गुड़ियाएँ सजाई जाती हैं।

इसे केवल सजावट कहना गलत होगा; वास्तव में यह अपनी आने वाली पीढ़ी को बिना किताबों के रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं से जोड़ने का सदियों पुराना देसी और कलात्मक तरीका है। पूरे नौ दिनों तक महिलाएं और बच्चे एक-दूसरे के घर गोलू देखने जाते हैं, पारंपरिक सुंदरकांड और भजन गाते हैं तथा एक-दूसरे को प्रसाद बाँटते हैं।

सिंदूर खेला से गोलू तक, भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहचान

देखा जाए तो ‘सिंदूर खेला’ और ‘गोलू’ दोनों का मिज़ाज, स्वरूप और भूगोल एक-दूसरे से पूरी तरह अलग है। सिंदूर खेला जहाँ पूर्वी भारत में विजयादशमी पर माँ की भावुक विदाई और सुहाग का उल्लास है, वहीं गोलू दक्षिण भारत में नौ दिनों तक परिवारों व समाज को जोड़ने का एक शांत और कलात्मक जरिया है।

न्यूयॉर्क के मेयर के नवरात्रि संदेश में इन दोनों स्थानीय परंपराओं का एक साथ शामिल होना यह साबित करता है कि दुनिया अब भारत के सिर्फ उन्हीं लोकप्रिय रंगों (जैसे गरबा) को नहीं देख रही जो दूर से दिखाई देते हैं, बल्कि वह हमारी उन गहरी सांस्कृतिक जड़ों और स्थानीय रीति-रिवाजों को भी पहचान रही है, जो सदियों से हमारे घरों में रचे-बसे हैं।

news desk

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