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तालिबान और भारत की बढ़ती नजदीकियों को लेकर उठते सवाल. भारतीय विदेश नीति के बदलने का क्या है कारण?

इतिहास में पहली बार तालिबान के किसी उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल का भारत आगमन हुआ है. 9 अक्टूबर को अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी अपने ऐतिहासिक दौरे पर नई दिल्ली पहुंचे. यह दौरा दोनों देशों के बीच संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है. तो कई सवालों को जन्म भी दे रहा है.

भारत ने बंद कर दिया था काबुल दूतावास

भारत और अफगानिस्तान के रिश्ते तो सदियों से ही ऐतिहासिक और रणनीतिक रहे हैं. लेकिन जब जब अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता संभालती है तो दोनों देशों के बीच आधिकारिक संवाद सीमित हो जाता था. लेकिन इस बार ऐसा नहीं दिख रहा है. शुरूआत में जरूर भारत ने सतर्कता बरती लेकिन अब भारत तालिबान के रिश्ते बढ़ाने की ओर बढ़ता दिख रहा है.

अगस्त 2021 में जब तालिबान ने काबुल पर कब्ज़ा किया और अफगानिस्तान की सत्ता संभाली, तो भारत ने सुरक्षा कारणों से न सिर्फ वहां मौजूद अपने राजनयिकों और स्टाफ़ को वापस बुला लिया था बल्कि काबुल दूतावास और कंधार, हेरात, जलालाबाद और मजार-ए-शरीफ में मौजूद भारतीय कांसुलेट्स को भी तत्काल बंद कर दिया गया था. हालांकि, भारत ने अफगान जनता की मदद जारी रखी थी और मानवीय सहायता (गेहूं, दवाइयां, कोविड वैक्सीन आदि) तालिबान शासन के दौरान भी भेजता रहा था. हालांकि अब मुत्ताकी का भारत दौरा संकेत दे रहा है कि धीरे-धीरे राजनयिक बातचीत की राहें खुल रही हैं.

क्या पाकिस्तान को घेरने की हो रही है कवायद?

इस यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत के मुंबई में कुछ दिन पहले अफगानिस्तान का नया कांसुलेट खोला गया. माना जा रहा है कि यह कदम अफगान नागरिकों और व्यापारियों की बढ़ती आवाजाही को देखते हुए उठाया गया है. मुंबई का यह नया कूटनीतिक केंद्र अफगान छात्रों, कारोबारियों और प्रवासी समुदाय के लिए मददगार साबित होगा.

विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस दौरे से भारत और अफगानिस्तान के बीच न केवल आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवीय सहयोग जैसे मुद्दों पर भी सकारात्मक प्रगति हो सकती है. लेकिन तालिबान के साथ संबंध सुधरने के पीछे जो सबसे बड़ी वजह बताई जा रही है वो ये कि इस समय तालिबान के संबंध पाकिस्तान से खराब हो रहे हैं. यही वजह है कि भारत तालिबान से रिश्ते बढ़ा रहा है. इसके अलावा रणनीतिक तौर पर भी अफगानिस्तान एक अहम केन्द्र हैं. साथ ही मनमोहन सरकार ने अफगानिस्तान में काफी निवेश किया था और चीन पाकिस्तान के गठजोड़ के मुकाबले अफगानिस्तान को भारत के करीब लाई थी.

क्या तालिबान पर भरोसा कर गलती कर रहा है भारत?

आज के बदलते दौर में भारत का तालिबान की तरफ जाना कई मामलों को देख कर जरूरी लग सकता है. जैसे इस समय श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल जैसे पड़ोसी देशों से भारत के रिश्ते ठंडे हैं. चीन और पाकिस्तान का खतरा बढ़ रहा है. तो अफगानिस्तान एक विकल्प के तौर पर दिखता है. लेकिन अमेरिका के अफगानिस्तान से जाने के बाद तालिबान सरकार पर चीन के प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता. ऐसे में तालिबान भारत के लिए कितना भरोसेमंद होगा, ये सवाल भी उठ रहा है. क्योंकि तालिबान का इतिहास भारत के लिए बेहतर नहीं रहा है.

24 दिसंबर 1999 भारतीय इतिहास का वह काला दिन है. जब काठमांडू से दिल्ली आ रही इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC-814 का पांच आतंकवादियों ने अपहरण कर कंधार ले गये, जहां तालिबान ने विमान को घेर लिया. सात दिन तक यात्री बंधक रहे और अंततः भारत सरकार को दबाव में आकर मसूद अज़हर, उमर शेख और मुश्ताक ज़रगर जैसे तीन कुख्यात आतंकियों को छोड़ना पड़ा. इसके अलावा कश्मीर के कई आतंकी संगठनों को भी तालिबान की मदद मिलती रही थी.

फिलहाल भारतीय विदेश नीति नये कदम उठा रही है. जो उम्मीदों से भरी तो है लेकिन संशय और सवाल भी जन्म ले रहे हैं.

news desk

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