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तेजस्वी vs तेजप्रताप vs रोहिणी: क्या यही है लालू परिवार में टकराव की असली वजह?

पटना. बिहार ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति में भी लालू प्रसाद यादव का प्रभाव हमेशा अलग रहा है. एक समय था जब वे विपक्ष के सबसे मुखर और प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते थे और अकेले दम पर मोदी सरकार को चुनौती देते थे. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनकी बिगड़ती सेहत ने राजनीतिक सक्रियता को काफी सीमित कर दिया. इसका सीधा असर आरजेडी की अंदरूनी राजनीति पर भी पड़ा है.

लालू यादव भले ही तेजस्वी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुके हैं, लेकिन परिवार के भीतर समीकरण बिगड़ते चले गए. हाल की घटनाओं को कई लोग महज़ बहन-भाई का विवाद मान रहे हैं, लेकिन असली कहानी उससे कहीं गहरी है.असल टकराव इस बात को लेकर है कि आरजेडी का भविष्य किसके हाथ में हो और पार्टी किस दिशा में जाए.

तीन मोर्चों पर बढ़ा संघर्ष

परिवार और पार्टी की लड़ाई तीन प्रमुख बिंदुओं पर केंद्रित है:

तेजस्वी यादव बनाम तेजप्रताप यादव

रोहिणी आचार्य की बढ़ती सक्रियता

पार्टी में निर्णय लेने की दिशा और नेतृत्व का सवाल

रोहिणी आचार्य का उभार

हाल के दिनों में रोहिणी आचार्य काफी सक्रिय रही हैं. सोशल मीडिया के माध्यम से वे नीतीश सरकार के फैसलों पर लगातार सवाल उठाती रही हैं.

उन्होंने कई मौकों पर तेजस्वी यादव की कार्यशैली और पार्टी संचालन के तरीके पर भी नाराज़गी जताई है.

रोहिणी को लगता है कि आरजेडी गरीबों, दलित-पिछड़ों और आम लोगों के मुद्दों से दूर होती जा रही है-जो लालू यादव की राजनीति की पहचान रही है. विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे को लेकर भी उनका तेजस्वी से गंभीर मतभेद हुआ. वह अपने समर्थकों को टिकट दिलाना चाहती थीं, लेकिन ऐसा नहीं हो सका.

तेजप्रताप और तेजस्वी का पुराना टकराव

तेजप्रताप यादव और तेजस्वी यादव के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं है. तेजस्वी को अधिक महत्व मिलने से तेजप्रताप खुद को लगातार हाशिये पर महसूस करते रहे.
पार्टी में निर्णय लेने से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों तक, हर जगह तेजप्रताप की भूमिका सीमित होती गई.

विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद परिवार और पार्टी में तनाव खुलकर सामने आ गया. एक पारिवारिक बैठक में बहस इतनी बढ़ गई कि चप्पल चलने तक की नौबत आ गई. यह घटना दर्शाती है कि परिवार के भीतर स्थिति कितनी गंभीर है.

आरजेडी के लिए खतरे की घंटी

इन लगातार बढ़ते विवादों से साफ है कि लालू का कुनबा एकजुट नहीं रहा. अगर लालू यादव और राबड़ी देवी ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया, तो न सिर्फ परिवार, बल्कि पूरी पार्टी अंदरूनी टूट की कगार पर पहुंच सकती है.
आरजेडी के भविष्य पर सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि नेतृत्व की लड़ाई अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि पारिवारिक प्रतिष्ठा का मामला बन चुकी है।

SYED MOHAMMAD ABBAS

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