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दिल्ली-NCR में नाबालिग से दुष्कर्म के मामले पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, निर्भया कांड का जिक्र कर सुरक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल

दिल्ली-एनसीआर में चलती स्लीपर बस के अंदर 11वीं की नाबालिग छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने एक बार फिर रूह कंपा दी है। इस रोंगटे खड़े करने वाले मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की बेंच ने 2012 के निर्भया कांड की डरावनी यादें ताजा करते हुए कहा कि इन दर्दनाक घटनाओं से खुद को रोक पाना मुश्किल है। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रशासनिक और कानून व्यवस्था आम नागरिकों की बुनियादी सुरक्षा सुनिश्चित करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।

क्या है चलती स्लीपर बस का सनसनीखेज मामला?

अगस्त 2026 के अंतिम दिनों में दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर एक ऐसी खौफनाक वारदात को अंजाम दिया गया, जिसने चलती बसों की सुरक्षा पर गंभीर और बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

11वीं कक्षा की एक नाबालिग छात्रा ने आरोप लगाया कि चलती स्लीपर बस के अंदर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म (Gang Rape) जैसी घिनौनी हरकत की गई। इस खौफनाक मामले के सामने आते ही पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए बस के ड्राइवर और कंडक्टर को धर दबोचा।

इस घटना के बाद से ही स्लीपर बसों के भीतर सुरक्षा व्यवस्था, सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी, एसओएस (SOS) बटन और नियमों की अनदेखी को लेकर बहस छिड़ गई है कि आखिर सार्वजनिक परिवहन कितना सुरक्षित है?

2012 के ‘निर्भया कांड‘ से की गई खौफनाक तुलना

मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने दो टूक शब्दों में कहा कि इन दर्दनाक घटनाओं की समानता को 2012 की निर्भया घटना से जोड़े बिना नहीं रहा जा सकता।

कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “दिल्ली-NCR में लगातार सामने आ रहे दुष्कर्म के ये मामले साफ तौर पर दिखाते हैं कि कानून लागू करने वाली और पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (लोक प्रशासन) की एजेंसियां ​​आम जनता की बुनियादी सुरक्षा सुनिश्चित करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही हैं।”

सार्वजनिक सुरक्षा और अधिकारियों की जवाबदेही पर कड़ा प्रहार

बेंच की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस पारदीवाला ने प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए सख्त लहजे में कहा कि पार्कों, बसों और अन्य सार्वजनिक स्थानों को खराब रोशनी, कमजोर निगरानी या जरूरी प्रशासनिक सुविधाओं के अभाव के चलते ‘खतरनाक जगह’ नहीं बनने दिया जा सकता।

कोर्ट ने दो टूक कहा कि ऐसे खौफनाक मामलों के सामने आने के बाद केवल नागरिकों की तरफ से मोमबत्तियां जलाना या एकजुटता दिखाना काफी नहीं है, बल्कि असली जरूरत इन मामलों में लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की है।

दिल्ली-NCR की इस घटना ने सार्वजनिक परिवहन में यात्रियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं सामने रखी हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद अब निगरानी व्यवस्था, सुरक्षा मानकों और प्रशासनिक जवाबदेही पर ध्यान केंद्रित है। स्लीपर बसों में CCTV, SOS बटन और सुरक्षा नियमों के पालन की व्यवस्था कितनी प्रभावी है, यह अहम सवाल बन गया है। अब जरूरत है कि संबंधित एजेंसियां सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करें और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम उठाएं।

news desk

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