हल्द्वानी हिंसा मामले में उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा कानूनी झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने मामले के मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक की जमानत रद्द करने की राज्य सरकार की याचिका को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने राज्य पुलिस द्वारा बिना ठोस वजहों के UAPA “गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून” जैसे कठोर आतंकवाद-रोधी कानून को लागू करने की मंशा और कानूनी आधार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
यह पूरा विवाद तब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जब उत्तराखंड सरकार ने नैनीताल हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें अब्दुल मलिक को जमानत दे दी गई थी। चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की।
पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की दलीलों को खारिज कर दिया और मलिक को मिली राहत में किसी भी प्रकार का दखल देने से साफ इनकार कर दिया।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये और UAPA के इस्तेमाल पर बेहद तीखी टिप्पणी की। पीठ ने सरकार के वकील से सीधा सवाल पूछा कि क्या सिर्फ इस आधार पर किसी आरोपी पर UAPA ठोका जा सकता है कि बेकाबू भीड़ ने पुलिस थाने को आग के हवाले कर दिया था? कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि हर कानून-व्यवस्था की स्थिति को आतंकवाद के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।
अदालत ने ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ और ‘आतंकवाद’ के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘पब्लिक ऑर्डर’ को संभालना एक प्रशासनिक चुनौती है, जबकि ‘UAPA’ का प्रयोग केवल देश की संप्रभुता, अखंडता और वास्तविक आतंकी गतिविधियों से निपटने के लिए किया जाना चाहिए। आम दंगे या पुलिस स्टेशन पर हमले जैसी घटना में सीधा UAPA लगा देना कानून की मूल भावना के विपरीत है।
आगे व्यक्तिगत आजादी का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि भले ही हाईकोर्ट के फैसले में कुछ कानूनी दलीलें पूरी तरह विस्तृत न रही हों, लेकिन नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे संवेदनशील विषय में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं दिखता। शीर्ष अदालत के इस रुख से संदेश साफ है कि राज्य सरकारें हर आपराधिक या हिंसक घटना में बिना किसी ठोस राष्ट्रविरोधी साक्ष्य के UAPA जैसे कड़े कानूनों का दुरुपयोग नहीं कर सकतीं।
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