फ्रांस के सबसे बड़े न्यूक्लियर प्लांट में जेलीफिश का ऐसा कहर, 3 रिएक्टर बंद; क्या परमाणु सुरक्षा पर मंडरा रहा खतरा?

पेरिस: फ्रांस के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र ग्रेवलाइन्स में जेलीफिश के बड़े झुंड ने कूलिंग सिस्टम को प्रभावित कर दिया। समुद्र से पानी खींचने वाले पंपों और फिल्टर में बड़ी संख्या में जेलीफिश फंसने के बाद प्लांट के चार में से तीन रिएक्टरों को बंद करना पड़ा। इस घटना के चलते बिजली उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। खास बात यह है कि करीब एक साल पहले भी इसी संयंत्र में जेलीफिश के कारण रिएक्टरों को बंद करना पड़ा था।

जेलीफिश के झुंड ने कूलिंग सिस्टम को किया प्रभावित

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, यह घटना 11 अगस्त 2026 को सामने आई। फ्रांस की सरकारी ऊर्जा कंपनी के अनुसार, रिएक्टर नंबर 2, 3 और 4 को बंद किया गया, जबकि रिएक्टर नंबर 1 का उत्पादन कम कर दिया गया। वहीं, रिएक्टर नंबर 5 पहले से ही रखरखाव के कारण बंद था।

कंपनी ने स्पष्ट किया है कि जेलीफिश के कूलिंग सिस्टम में पहुंचने की घटना से संयंत्र की सुरक्षा, कर्मचारियों या पर्यावरण को कोई खतरा नहीं है। समस्या समुद्र से पानी लेने वाले इनटेक सिस्टम में जेलीफिश के बड़े झुंड के पहुंचने के कारण पैदा हुई।

परमाणु संयंत्र में कूलिंग सिस्टम इतना अहम क्यों?

परमाणु रिएक्टर में ऊर्जा उत्पादन के दौरान भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी को नियंत्रित करने और संयंत्र को सुरक्षित तरीके से संचालित करने के लिए कूलिंग सिस्टम बेहद महत्वपूर्ण होता है।

ग्रेवलाइन्स का कूलिंग सिस्टम समुद्री पानी पर निर्भर है। समुद्र से पानी खींचने की इसी व्यवस्था के कारण समुद्री जीव-जंतु कभी-कभी संयंत्र के लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं। बड़ी संख्या में जेलीफिश एक साथ पहुंचने पर पानी खींचने वाले पंपों और फिल्टरों को प्रभावित कर सकती हैं, जैसा इस बार हुआ।

फ्रांस के सबसे बड़े परमाणु संयंत्रों में शामिल है ग्रेवलाइन्स

ग्रेवलाइन्स परमाणु ऊर्जा संयंत्र उत्तरी फ्रांस में डनकर्क और कलैस के बीच समुद्र के किनारे स्थित है। यह फ्रांस ही नहीं, बल्कि पश्चिमी यूरोप के सबसे बड़े परमाणु बिजली संयंत्रों में शामिल है।

संयंत्र में कुल छह दबावयुक्त जल रिएक्टर हैं। प्रत्येक रिएक्टर की क्षमता करीब 910 मेगावाट बताई गई है। संयंत्र का निर्माण 1970 के दशक के मध्य में शुरू हुआ था। इसके पहले दो रिएक्टर 1980 में, अगले दो 1981 में और पांचवें तथा छठे रिएक्टर 1985 में चालू हुए थे।

समुद्र के किनारे स्थित होने के कारण यहां कूलिंग के लिए समुद्री पानी आसानी से उपलब्ध है, लेकिन यही व्यवस्था समुद्र में मौजूद जीव-जंतुओं के संयंत्र के इनटेक सिस्टम तक पहुंचने का जोखिम भी पैदा करती है।

एक साल पहले भी जेलीफिश के कारण बंद हुए थे रिएक्टर

ग्रेवलाइन्स में जेलीफिश के कारण रिएक्टरों के संचालन पर असर पड़ने की यह पहली घटना नहीं है। 2025 में भी बड़ी संख्या में जेलीफिश कूलिंग सिस्टम से जुड़े पाइपों में पहुंच गई थीं। इसके बाद संयंत्र के कई रिएक्टरों को बंद करना पड़ा था।

उस समय दो रिएक्टर पहले से रखरखाव के कारण बंद थे, जबकि जेलीफिश की समस्या सामने आने के बाद चार अन्य रिएक्टरों को भी बंद करना पड़ा था। तब भी सरकारी ऊर्जा कंपनी ने कहा था कि इस घटना से संयंत्र की सुरक्षा या पर्यावरण पर कोई असर नहीं पड़ा।

तैयारियों के दावे के बावजूद फिर कैसे पहुंचीं जेलीफिश?

इस बार की घटना इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि हाल में सरकारी ऊर्जा कंपनी की ओर से दावा किया गया था कि जेलीफिश जैसी घटनाओं से निपटने के लिए जरूरी तैयारियां की गई हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में जेलीफिश कूलिंग सिस्टम के इनटेक तक पहुंच गईं और तीन रिएक्टरों को बंद करना पड़ा।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि तमाम तैयारियों के बावजूद जेलीफिश के झुंड को सिस्टम तक पहुंचने से क्यों नहीं रोका जा सका। हालांकि, मौजूदा जानकारी के मुताबिक इस घटना को परमाणु सुरक्षा के लिए तत्काल खतरे के तौर पर नहीं देखा गया है।

जेलीफिश को हटाने के लिए उठाए गए कदम

जेलीफिश की मौजूदगी का पता चलने के बाद उन्हें कूलिंग सिस्टम से हटाने के लिए कई उपाय किए गए। रिपोर्ट के मुताबिक, समुद्र में मौजूद जेलीफिश के झुंड को संयंत्र के इनटेक सिस्टम से दूर रखने के लिए मछली पकड़ने वाली नावों की मदद ली गई।

इसके अलावा संयंत्र के इनटेक से जेलीफिश को बाहर निकालने के लिए वैक्यूम का इस्तेमाल किया जा रहा है। अब निगाह इस बात पर है कि कूलिंग सिस्टम को सामान्य स्थिति में लाने और बंद किए गए रिएक्टरों को दोबारा शुरू करने में कितना समय लगता है।

vineet verma

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