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1893 में जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ़्रीका पहुँचे, तब उनके जीवन की दिशा को लेकर कोई पूर्वनियोजित ऐतिहासिक योजना नहीं थी। वे न तो किसी साम्राज्य को चुनौती देने गए थे, न ही किसी आंदोलन का नेतृत्व करने। वे एक युवा वकील थे, जिन्होंने लंदन से क़ानून की पढ़ाई की थी और जिन्हें अभी तक ब्रिटिश साम्राज्य की न्यायप्रियता पर भरोसा था। दक्षिण अफ़्रीका जाना उनके लिए एक पेशेवर अवसर था, एक अस्थायी यात्रा—लेकिन यही यात्रा आगे चलकर उनके जीवन और आधुनिक राजनीति दोनों की दिशा बदलने वाली सिद्ध हुई।
दक्षिण अफ़्रीका उस समय नस्लीय विभाजन की प्रयोगशाला था। श्वेत अल्पसंख्यक सत्ता के बल पर कानून गढ़ रहा था और एशियाई तथा अफ्रीकी समुदायों को व्यवस्थित रूप से दूसरे दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा था। भारतीयों को ‘कुली’ कहकर संबोधित किया जाता था, उनके आवागमन, व्यवसाय और निवास पर कड़े प्रतिबंध थे। गांधी ने इस व्यवस्था को केवल सामाजिक अन्याय के रूप में नहीं, बल्कि कानून के माध्यम से स्थापित अमानवीयता के रूप में देखा। यही बोध उनके लिए निर्णायक सिद्ध हुआ।
पिटर्मैरिट्ज़बर्ग रेलवे स्टेशन पर प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद उन्हें ट्रेन से बाहर फेंक दिया जाना केवल एक व्यक्तिगत अपमान नहीं था। वह क्षण उस भ्रम का अंत था, जिसमें गांधी यह मानते थे कि साम्राज्य के भीतर न्याय सभी के लिए समान है। ठंडी रात में प्लेटफ़ॉर्म पर बैठे गांधी ने आत्ममंथन किया। उन्होंने बाद में लिखा कि उस रात उनके सामने दो रास्ते थेअपमान को स्वीकार कर लौट जाना, या अन्याय के विरुद्ध टिके रहना। उन्होंने दूसरा मार्ग चुना। यही निर्णय उन्हें एक पेशेवर वकील से नैतिक प्रतिरोध के मार्ग पर ले गया।
शुरुआती वर्षों में गांधी ने अन्याय के विरुद्ध वही साधन अपनाए, जो एक कानून में विश्वास रखने वाला व्यक्ति अपनाता है। उन्होंने याचिकाएँ लिखीं, प्रतिनिधिमंडल बनाए, ब्रिटिश अधिकारियों से संवाद किया। किंतु धीरे-धीरे उन्हें यह स्पष्ट होने लगा कि जब कानून स्वयं अन्याय को वैध बना दे, तब केवल कानूनी लड़ाई पर्याप्त नहीं होती। इस बिंदु पर गांधी के भीतर राजनीति की एक नई समझ विकसित हुई—ऐसी राजनीति जो सत्ता से नहीं, नैतिकता से संचालित हो।
दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय समुदाय बिखरा हुआ था। भाषा, धर्म और वर्ग के आधार पर विभाजन था। गांधी ने इस बिखराव को आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी के रूप में पहचाना। उन्होंने लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि सम्मान और अधिकार किसी एक व्यक्ति या वर्ग की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की साझा जिम्मेदारी है। यहीं से गांधी का रूपांतरण एक व्यक्तिगत संघर्षकर्ता से सामूहिक चेतना के निर्माता के रूप में होने लगा।
1906 में ट्रांसवाल सरकार द्वारा एशियाई लोगों पर अनिवार्य पंजीकरण कानून लागू किया गया। इस कानून के तहत उंगलियों के निशान देना और हर समय पहचान पत्र साथ रखना अनिवार्य था। गांधी ने इसे केवल अपमानजनक नहीं, बल्कि आत्मसम्मान के विरुद्ध माना। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘पैसिव रेज़िस्टेंस’ शब्द को अपर्याप्त समझते हुए एक नया शब्द गढ़ा—सत्याग्रह। यह केवल भाषा का परिवर्तन नहीं था, बल्कि राजनीति की आत्मा का पुनर्निर्माण था।
सत्याग्रह का अर्थ था सत्य के लिए आग्रह, अन्यायपूर्ण कानून का उल्लंघन, और दंड को स्वेच्छा से स्वीकार करना। इसमें हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं था, लेकिन इसमें कायरता के लिए भी कोई गुंजाइश नहीं थी। गांधी के लिए सत्याग्रह आत्मबल की परीक्षा था। सत्याग्रही को अपने भीतर के भय, क्रोध और घृणा से पहले संघर्ष करना होता था। यह विचार उस समय की प्रचलित राजनीतिक सोच से बिल्कुल भिन्न था, जहाँ प्रतिरोध को शक्ति-प्रदर्शन से जोड़ा जाता था।
दक्षिण अफ़्रीका में सत्याग्रह का व्यावहारिक प्रयोग अत्यंत कठिन था। सत्याग्रहियों को जेलों में डाला गया, उन पर अत्याचार हुए, आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। स्वयं गांधी को कई बार कारावास झेलना पड़ा। किंतु इन कष्टों ने आंदोलन को कमजोर नहीं किया, बल्कि उसकी नैतिक वैधता को और मज़बूत किया। पहली बार दुनिया ने देखा कि बिना हथियार उठाए भी सत्ता की नींव को हिलाया जा सकता है।
गांधी ने यह भी समझा कि यदि राजनीति जीवन से कटी हुई होगी, तो वह केवल नारेबाज़ी बनकर रह जाएगी। इसी सोच के तहत उन्होंने फीनिक्स सेटलमेंट और बाद में टॉल्स्टॉय फ़ार्म की स्थापना की। ये स्थान केवल आश्रम नहीं थे, बल्कि सामाजिक प्रयोगशालाएँ थीं। यहाँ श्रम, समानता, सादगी और आत्मनिर्भरता का अभ्यास किया गया। सभी लोग शारीरिक श्रम करते थे, कोई ऊँच-नीच नहीं थी, और जीवन की आवश्यकताओं को न्यूनतम रखने पर ज़ोर था। गांधी के लिए यह जीवन-शैली राजनीति का ही विस्तार थी।
दक्षिण अफ़्रीका के वर्षों में गांधी का धार्मिक दृष्टिकोण भी गहराया। उन्होंने भगवद्गीता, बाइबिल, जैन परंपरा और टॉल्स्टॉय के लेखन का गंभीर अध्ययन किया। इन सबका निष्कर्ष उनके लिए एक ही था—धर्म का सार नैतिक आचरण है, न कि कर्मकांड या पहचान। अहिंसा उनके लिए केवल रणनीति नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुशासन बन गई। यही कारण है कि उनके राजनीतिक निर्णयों में भी आत्मसंयम और करुणा केंद्रीय मूल्य बने रहे।
इन वर्षों में गांधी का बाहरी व्यक्तित्व जितना बदला, उससे अधिक परिवर्तन उनके भीतर हुआ। उन्होंने अपने पहनावे को सरल किया, अपनी आवश्यकताओं को सीमित किया और अपने भय से सीधे संवाद किया। यह आत्मपरिवर्तन गांधी की राजनीति की बुनियाद था। वे मानते थे कि जो व्यक्ति स्वयं पर शासन नहीं कर सकता, वह समाज को नैतिक दिशा नहीं दे सकता।
दक्षिण अफ़्रीका का अनुभव गांधी के लिए एक दीर्घ प्रशिक्षण था। भारत में बाद में जो कुछ हुआ—चंपारण, असहयोग, दांडी—उन सबकी वैचारिक और नैतिक तैयारी यहीं हुई। यदि दक्षिण अफ़्रीका गांधी के जीवन से हटा दिया जाए, तो भारत का स्वतंत्रता संग्राम भी वैसा नहीं दिखेगा जैसा इतिहास में दर्ज है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दक्षिण अफ़्रीका गांधी के लिए अपमान की भूमि नहीं, बल्कि पुनर्जन्म की भूमि थी। यहीं एक साधारण वकील ने यह समझा कि राजनीति केवल सत्ता बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मनुष्य को बेहतर बनाने की नैतिक जिम्मेदारी है। यहीं से गांधी इतिहास की घटना नहीं, बल्कि एक सतत नैतिक परियोजना के रूप में आकार लेने लगे—एक ऐसी परियोजना, जो आगे चलकर भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की चेतना को प्रभावित करने वाली थी।
(क्रमशः – भाग 3 अगले दिन)
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और ये उनके निजी विचार हैं।)
कुलदीप वशिष्ठ, स्वतंत्र पत्रकार
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