नई दिल्ली। खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों के बीच कतर और तेहरान को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही है। अब तक ईरान उन देशों को निशाना बना रहा था, जो किसी न किसी रूप में अमेरिका का समर्थन कर रहे थे। लेकिन अब कतर और ईरान के बीच एक “साइलेंट डील” की चर्चा तेज हो गई है।
इस डील को “साइलेंट” इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि 20 मार्च के बाद से ईरान ने कतर पर कोई बड़ा हमला नहीं किया है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि दोनों देशों के बीच अंदरखाने कोई बड़ा समझौता हुआ है, जिसके जरिए अमेरिका को भी एक संदेश देने की कोशिश की गई है। कतर का रुख भी अब काफी हद तक साफ नजर आ रहा है। इस कथित डील के बाद पहली बार कतर ने आधिकारिक तौर पर खुद को ईरान से जुड़े युद्ध से अलग कर लिया है। इतना ही नहीं, उसने एक बयान में अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी तरह की मध्यस्थता से भी इनकार कर दिया है।
कतर और ईरान के बीच कथित समझौते को लेकर मिडिल ईस्ट में अटकलें तेज हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान को 6 बिलियन डॉलर देने के बदले कतर के ऊर्जा ठिकानों पर हमले रोकने की बात सामने आई है।
JFeed की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ है, जिसके तहत अगर ईरान कतर के तेल और गैस ठिकानों पर हमला नहीं करता, तो उसे 6 बिलियन डॉलर दिए जाएंगे।
बताया जा रहा है कि यह रकम साल 2023 में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा कतर को दी गई थी। उस समय ईरान ने कुछ अमेरिकी कैदियों को रिहा किया था, जिसके बदले यह पैसा ईरान को मिलना था। हालांकि, बाद में कतर ने यह राशि देने से इनकार कर दिया था।
अब रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि इस नई डील के तहत कतर यह पूरी रकम ईरान को देगा। यह राशि सीधे Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) को मिलने की बात कही जा रही है, जो मौजूदा संघर्ष में अहम भूमिका निभा रही है।
ईरान के हमलों में अब तक कतर के 4 नागरिकों की मौत हो चुकी है, जबकि 16 लोग घायल हुए हैं। हमलों का मुख्य निशाना कतर के LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) ठिकाने रहे हैं।
QatarEnergy के मुताबिक, इन हमलों के कारण गैस उत्पादन में करीब 17% तक की कमी आ सकती है। कतर भारत, चीन और अमेरिका जैसे देशों को बड़ी मात्रा में गैस सप्लाई करता है, ऐसे में इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
कतर और ईरान के बीच कथित 6 बिलियन डॉलर की डील ने मिडिल ईस्ट की राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, इस समझौते की आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हुई है, लेकिन इसके संभावित असर दूरगामी हो सकते हैं।
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