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Russia-Ukraine War: यूरोप से खदेड़े गए रूसी जासूसों ने जापान को बनाया नया ‘अड्डा’, यूक्रेन के खिलाफ मिसाइल और ड्रोन बनाने के लिए चुरा रहे हैं सीक्रेट टेक!

Highlights

  • ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा: जापान में सक्रिय हैं रूस के कई खतरनाक खुफिया अधिकारी।
  • यूक्रेन का दावा- रूसी मिसाइलों और घातक ड्रोन में इस्तेमाल हो रहे हैं 90% जापानी पुर्जे।
  • टोक्यो में ’20वीं डायरेक्टरेट’ नाम की रूसी सैन्य खुफिया यूनिट कारोबारी बनकर कर रही है जासूसी।
  • ‘स्पाई पैराडाइज’ कहे जाने वाले जापान में काउंटर-इंटेलिजेंस कमजोर, 2026 में नया कानून लाने की तैयारी।

टोक्यो। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच मॉस्को के जासूसी नेटवर्क को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा खुलासा हुआ है। ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन पर हमले के बाद यूरोप और उत्तरी अमेरिका से खदेड़े गए कई रूसी खुफिया अधिकारी अब जापान को अपना नया ठिकाना बना चुके हैं। इन जासूसों का मुख्य मकसद जापान की बेहद आधुनिक तकनीक (Advanced Technology) हासिल करना है, जिसका इस्तेमाल रूस अपने मिसाइल, लड़ाकू ड्रोन और अन्य घातक हथियार बनाने में कर सके।

जापान क्यों बना रूसी जासूसों का नया ‘हब’?

पश्चिमी देशों के मौजूदा और पूर्व खुफिया अधिकारियों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोप से बड़े पैमाने पर निकाले जाने के बाद रूस के लिए वहां जासूसी करना लगभग असंभव हो गया था। ऐसे में रूस ने जापान का रुख किया। जापान की बेहतरीन आधुनिक तकनीक और वहां की कमजोर काउंटर-इंटेलिजेंस (Counter-Intelligence) व्यवस्था की वजह से यह देश रूसी जासूसों के लिए सबसे आसान और अहम निशाना बन गया है।

रूसी हथियारों में जापानी पुर्जे: यूक्रेन के अधिकारियों ने दावा किया है कि रूस की लगभग 90% मिसाइलों और ड्रोनों में जापान में बने पुर्जों का इस्तेमाल हो रहा है। ये पुर्जे मुख्य रूप से आम नागरिक इस्तेमाल (Dual-Use Technology) के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन रूस चालाकी से इन्हें हथियारों में फिट कर रहा है। इसी वजह से इनकी ओपन मार्केट बिक्री पर पूरी तरह रोक लगाना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है।

टोक्यो में एक्टिव है खतरनाक ’20वीं डायरेक्टरेट’ यूनिट

रिपोर्ट के अनुसार, रूस की मिलिट्री खुफिया एजेंसी की ’20वीं डायरेक्टरेट’ (20th Directorate) नाम की एक स्पेशल यूनिट इस समय टोक्यो से अपना नेटवर्क चला रही है। इसके एजेंट बड़े कारोबारी या राजनयिक (Diplomats) बनकर जापानी कंपनियों से संपर्क साधते हैं। इसके बाद वे ऐसी संवेदनशील तकनीक या इलेक्ट्रॉनिक्स सामान खरीद लेते हैं, जिसे बाद में तीसरे देश के रास्ते रूस के सैन्य कार्यक्रम में भेज दिया जाता है।

  • एयरोफ्लोट का कनेक्शन: रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि इस जासूसी नेटवर्क का प्रमुख रूस की सरकारी एयरलाइन ‘एयरोफ्लोट’ के एक कर्मचारी के रूप में काम कर रहा था। सोवियत संघ के जमाने से ही रूस इस एयरलाइन का इस्तेमाल अपने जासूसों की पहचान छिपाने के लिए करता आ रहा है।

जापान सरकार की सुस्ती और ‘स्पाई पैराडाइज’ का ठप्पा

वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से जापान को ‘स्पाई पैराडाइज’ (जासूसों के लिए स्वर्ग) कहते रहे हैं, क्योंकि वहां अलग से कोई मजबूत विदेशी खुफिया एजेंसी नहीं है और जापान काफी हद तक अमेरिकी इनपुट्स पर निर्भर रहता है।

यूक्रेन ने जापान सरकार को कई ऐसे पुख्ता दस्तावेज और सबूत सौंपे हैं जो बताते हैं कि जापानी तकनीक का इस्तेमाल यूक्रेनी नागरिकों पर बरसने वाले रूसी मिसाइलों में हो रहा है। हालांकि, जापान सरकार ने इस खतरे पर अब तक बेहद धीमी प्रतिक्रिया दी है, लेकिन अब वह एक्शन मोड में आ रही है।

2026 में बड़े बदलाव की तैयारी

इस बड़े जासूसी नेटवर्क के खुलासे के बाद अब जापान अपनी सुरक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव कर रहा है। जापान ने ‘नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल’ और ‘नेशनल इंटेलिजेंस ब्यूरो’ बनाने का कानून पास कर दिया है। इसके अलावा, साल 2026 में देश में एक नया और बेहद सख्त ‘एंटी-एस्पियोनेज कानून’ (Anti-Espionage Law) लाने की तैयारी है, ताकि विदेशी जासूसों पर सीधे नकेल कसी जा सके।

news desk

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