विचार

रिंकू का ओवर और राइवलरी का बदलता अर्थ: क्या भारत–पाक मुकाबले से गायब हो गई वो अनिश्चितता?

रिंकू का ओवर और राइवलरी का बदलता अर्थ : भारत–पाकिस्तान का मुकाबला कभी सिर्फ एक खेल नहीं था, वह सामूहिक भावनाओं का विस्फोट था। टेलीविज़न के सामने बैठा दर्शक हर गेंद के साथ सांस रोकता था। 90 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में यह टक्कर अनिश्चितता की परिभाषा थी। पाकिस्तान की तेज़ गेंदबाज़ी, उनकी आक्रामक देह-भाषा और अचानक मैच पलट देने की क्षमता इस राइवलरी को खतरनाक बनाती थी। भारत तब उतना सर्वशक्तिमान नहीं था, इसलिए परिणाम आख़िरी ओवर तक धुंध में छिपा रहता था। वही धुंध, वही अनिश्चितता इस मुकाबले का असली रोमांच थी।

समय बदला है। भारतीय टीम अब एक संतुलित, व्यवस्थित और गहरी बेंच स्ट्रेंथ वाली इकाई के रूप में सामने आई है। दूसरी ओर पाकिस्तान प्रतिभा के बावजूद निरंतरता से जूझता दिखाई देता है। इस बदले हुए परिदृश्य का सबसे प्रतीकात्मक दृश्य हालिया मैच में देखने को मिला, जब रिंकू सिंह को गेंद थमाई गई। रिंकू मूलतः बल्लेबाज़ हैं; गेंदबाज़ी उनका मुख्य कौशल नहीं। ऐसे हाई-वोल्टेज मुकाबले में पार्ट-टाइम विकल्प का इस्तेमाल तभी होता है जब कप्तान को पूरा भरोसा हो कि मैच उसकी मुट्ठी में है। यह सिर्फ एक ओवर नहीं था, बल्कि मैच की मनोवैज्ञानिक स्थिति का बयान था।

पहले भारत–पाकिस्तान मैच में हर गेंदबाज़ी बदलाव जोखिम जैसा लगता था। कप्तान का हर फैसला रणनीतिक जुआ प्रतीत होता था। लेकिन जब खेल नियंत्रण में हो और प्रयोग संभव लगे, तो दर्शक के भीतर की धड़कन स्थिर हो जाती है। यही वह क्षण था जिसने संकेत दिया कि राइवलरी का संतुलन बदल चुका है। वर्ल्ड कप में 7–1 का रिकॉर्ड पहले ही मानसिक बढ़त की कहानी कह चुका है। ऐसे में जब मैदान पर भी प्रयोग की गुंजाइश दिखे, तो यह बताता है कि भय का तत्व किस ओर झुका हुआ है।

मैच से पहले दिए गए आत्मविश्वास भरे बयान—कि टीम 160–170 का स्कोर भी बचा सकती है, कि वे अलग अंदाज़ में खेलते हैं—कागज़ पर प्रभावशाली लगते हैं। मगर मैदान पर उनकी सच्चाई वही होती है जो शुरुआती ओवरों में दिखाई दे। अगर पावरप्ले में दबाव न बन पाए, अगर विपक्ष को खतरा महसूस न हो, तो बयान हवा में घुल जाते हैं। रिंकू का ओवर इसी वास्तविकता की ओर इशारा करता है।

राइवलरी का असली आनंद जीत में नहीं, बल्कि उस आशंका में है कि हार भी संभव है। जब सामने वाली टीम मज़बूत हो, तब हर रन की कीमत होती है और हर गेंद कहानी बन जाती है। आज यह कहानी एकतरफ़ा आत्मविश्वास और दूसरी ओर तलाश की स्थिति में खड़ी दिखती है। इसका अर्थ यह नहीं कि राइवलरी समाप्त हो गई है, बल्कि यह कि उसका स्वर बदल गया है। वह आग जो अनिश्चितता से जलती थी, अब संतुलन की प्रतीक्षा कर रही है।

रिंकू सिंह का वह एक ओवर एक सांकेतिक क्षण बन गया—एक ऐसा क्षण जिसने बता दिया कि इस समय कौन नियंत्रण में है और किसे पुनर्निर्माण की ज़रूरत है। भारत–पाकिस्तान मुकाबले का जादू खत्म नहीं हुआ है, पर उसकी तीव्रता बदल गई है। वह फिर उसी ऊँचाई पर तभी पहुँचे

कुलदीप वशिष्ठ, स्वतंत्र पत्रकार
news desk

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