राघोपुर कैसे बना बिहार की राजनीति का सबसे शक्तिशाली प्रतीक?
वैशाली — जिसे करीब 600 ईसा पूर्व लिच्छवियों ने एशिया के पहले गणराज्य के रूप में विकसित किया था, वहीं से गंगा की दो धाराओं के बीच स्थित एक विधानसभा क्षेत्र आता है — राघोपुर.
प्राचीन गणतंत्र की इस भूमि पर आधुनिक लोकतंत्र-व्यवस्था की सबसे दिलचस्प कहानी लिखी जा रही है. राघोपुर महज़ एक विधानसभा सीट नहीं — यह बिहार की राजनीति का वह अध्याय है जिसमें सत्ता के उत्थान-पतन, पारिवारिक विरासत और जनता के विश्वास की गाथा समाई हुई है.
यह वही राघोपुर है, जिसने लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री की गद्दी दिलाई, राबड़ी देवी को बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बनाया और आज तेजस्वी यादव के रूप में नई पीढ़ी की राजनीति को जड़ें दे रहा है. तीन दशकों से यह सीट एक परिवार की राजनीतिक यात्रा का साक्षी बनी हुई है.
जब रखी गयी ‘लालूगढ़’ की नींव
यह साल था 1995 , जब बिहार की सियासत में लालू प्रसाद यादव की लोकप्रियता अपने चरम पर थी. उन्होंने जनता दल से अलग होकर अपनी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल बनाई थी. जब उन्होंने राघोपुर से चुनाव लड़ा तो भारी बहुमत से जीत हासिल की थी. कहते हैं जब लालू की जनसभाओं में उनका भाषण गूंजता था, तो पूरा राघोपुर तालियों, सीटियों और नारों से गूंज उठता था. राघोपुर की यह जीत सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं थी, बल्कि बिहार की सियासत में लालू युग की नींव थी.
यह जीत केवल एक सीट जीतना नहीं था, बल्कि बिहार में ‘लालू युग’ की मजबूत आधारशिला थी — एक ऐसा दौर जिसने राज्य की राजनीति की धुरी ही बदल दी. राघोपुर ने लालू को ताकत दी और लालू ने राघोपुर को एक पहचान.
राबड़ी देवी बनीं सीएम
जब साल 1997 में लालू का नाम चारा घोटाले में आया तब उन्होंने एक अहम फैसला लेते हुए सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया. लोगों ने कहा, “एक गृहिणी राजनीति कैसे संभालेगी?” लेकिन राघोपुर ने फिर साबित किया कि यह सीट विश्वास की जननी है.
राबड़ी देवी ने 2000 और 2005 (फरवरी) के चुनाव जीते और अपने सादगी भरे अंदाज़ में सत्ता को संभाला.
जब दरक गया ‘अजेय किले’ का मिथक
लेकिन राजनीति में कोई किला हमेशा अजेय नहीं रहता. 2005 के अक्टूबर चुनाव में तस्वीर पलट गई. जेडीयू के उम्मीदवार सतीश कुमार ने राबड़ी देवी को करारी शिकस्त दे दी. यह हार एक राजनीतिक भूकंप के समान थी — पहली बार किसी ने लालू परिवार के मजबूत गढ़ में सेंध लगाई थी.
2010 में इतिहास दोहराया गया. सतीश कुमार ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की. ‘लालूगढ़’ कहे जाने वाले राघोपुर में यह दो लगातार हारें आरजेडी के लिए एक कठिन परीक्षा थीं — ऐसा समय जब पार्टी की जड़ें हिल गई थीं और सवाल उठने लगे थे कि क्या लालू युग का अंत हो चुका है?
2015: तेजस्वी का ‘युवा तूफान’ और शानदार वापसी
और फिर आया 2015 — एक नए दौर की शुरुआत. इस बार मैदान में उतरे तेजस्वी यादव — लालू-राबड़ी के बेटे, लेकिन 21वीं सदी के युवा चेहरे के साथ. पहली बार राजनीति में कदम रख रहे तेजस्वी के सामने दोहरी चुनौती थी — सीट जीतना और परिवार की खोई हुई साख को वापस लाना.
युवा ऊर्जा, आधुनिक सोच, सोशल मीडिया की समझ और पुरानी विरासत का अनूठा मिश्रण — तेजस्वी ने इन सभी को एक साथ पिरोकर राघोपुर में ऐसी धमाकेदार वापसी की कि पूरे बिहार की नज़रें उन पर टिक गईं. उन्होंने न केवल सीट जीती, बल्कि बिहार की युवा राजनीति के सबसे चर्चित चेहरा बन गए.
2020 में भी तेजस्वी ने अपनी जीत को दोहराया. आज वे बिहार के विपक्ष की सबसे मुखर आवाज़ हैं.
राघोपुर क्यों है खास ?
राघोपुर सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं, यह बिहार की राजनीतिक नब्ज है. यहां यादव और मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में हैं, लेकिन असली जादू उस भावनात्मक जुड़ाव में है जो जनता को “लालू परिवार” से जोड़े रखता है. यह सीट बताती है कि बिहार में राजनीति सिर्फ जातीय गणित नहीं — बल्कि भावनाओं और उम्मीदों का संगम भी है.
2025 में फिर प्रतिष्ठा की जंग
अब बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव करीब हैं. तेजस्वी यादव एक बार फिर इसी सीट से मैदान में उतरे हैं, जबकि एनडीए इस “अजेय किले” को गिराने के लिए कमर कस चुका है. राघोपुर में चुनाव अब सिर्फ वोटों की लड़ाई नहीं रहे — बल्कि यह बन चुकी है प्रतिष्ठा और वर्चस्व की जंग.
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