ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची द्वारा टीवी पर दिए गए एक इंटरव्यू ने उस चिंगारी को हवा दे दी है, जो अब मशहद से लेकर तेहरान तक विरोध की आग बन चुकी है। कट्टरपंथी गुटों का मानना है कि सरकार ‘शांति’ के नाम पर ईरान की सबसे बड़ी ताकत-होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)—पर अपना नियंत्रण खो रही है।
अराघची ने इंटरव्यू में स्वीकार किया कि समझौते के तहत ‘होर्मुज का प्रशासन पहले जैसा नहीं रहेगा’। इस एक वाक्य ने सुरक्षा विशेषज्ञों और कट्टरपंथियों को नाराज कर दिया है।
देश के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित मशहद शहर विरोध का केंद्र बन गया है। फार्स न्यूज द्वारा जारी फुटेज में प्रदर्शन का मंजर कुछ ऐसा है:
एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तानी अधिकारी दावा कर रहे हैं कि रविवार तक समझौता फाइनल हो जाएगा और इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर समारोह की तैयारी है। दूसरी तरफ, ईरान का विदेश मंत्रालय इस समयसीमा को लेकर पूरी तरह रक्षात्मक मुद्रा में है।
“यह कल नहीं होगा।” — इस्माइल बघाई, प्रवक्ता, ईरानी विदेश मंत्रालय
यह विवाद केवल एक समझौते का नहीं, बल्कि ईरान के भविष्य की दिशा का है। यदि अराघची और गालिबाफ कट्टरपंथियों को शांत करने में विफल रहते हैं, तो यह शांति समझौता होने से पहले ही ईरान के भीतर एक बड़े राजनीतिक संकट को जन्म दे सकता है। सवाल अब यह है कि क्या तेहरान अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए अपनी ‘सामरिक ढाल’ (होर्मुज) को छोड़ने को तैयार है?
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