नई दिल्ली: भारत की सर्वोच्च अदालत ने देश की करोड़ों बेटियों के हक में एक ऐसी लकीर खींच दी है, जो न सिर्फ हेल्थ बल्कि सोसाइटी के सोच को भी बदल देगी। सुप्रीम कोर्ट ने क्लियर कर दिया है कि स्कूलों में लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड्स और साफ शौचालय देना कोई दान नहीं, बल्कि उनका संवैधानिक ‘जीवन का अधिकार’ है।
आखिर क्यों जरूरी माना गया कदम?
भारत में आज भी मासिक धर्म यानि (पीरियड्स) को लेकर कई भ्रांतियां और शर्मिंदगी जुड़ी हुई है। आंकड़ों के अनुसार, बुनियादी सुविधाओं और जागरूकता की कमी के कारण लाखों लड़कियां हर साल अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं।
कोर्ट ने इस फैसले के जरिए समाज को तीन बड़े संदेश दिए हैं:
मासिक धर्म कोई बीमारी या अपवित्रता नहीं है, ये एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इस पर खुलकर बात होनी चाहिए।
अब शिक्षा में बाधा नहीं बनेगा पीरियड, पैड्स और शौचालय की कमी से अब किसी बच्ची का स्कूल नहीं छूटेगा।
स्कूलों को देना होगा अब जवाब, अगर स्कूल लड़कियों की गरिमा का ख्याल नहीं रखते, तो उन्हें चलाने का हक नहीं है।
जागरूकता के लिए उठाए गए 5 बड़े कदम
1- सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला केवल सुविधाओं के बारे में नहीं, बल्कि समाज की सोच बदलने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। इस निर्णय के तहत राज्यों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वो मुफ्त सैनिटरी पैड्स का वितरण सुनिश्चित करें ताकि
2-आर्थिक तंगी किसी भी छात्रा की शिक्षा और स्वास्थ्य के बीच बाधा न बने।
इसके साथ ही, स्कूलों में अलग और साफ शौचालयों की अनिवार्यता की गई है, जिससे लड़कियों को स्कूल परिसर में पूरी प्राइवेसी और सुरक्षा मिल सके।
3-अदालत ने जागरूकता अभियानों पर विशेष जोर दिया है ताकि मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक सोच और पुरानी भ्रांतियों को जड़ से खत्म किया जा सके।
4-स्वच्छता के साथ-साथ पर्यावरण और स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए इस्तेमाल किए गए पैड्स के लिए बेहतर डिस्पोजल सिस्टम विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि संक्रमण का खतरा न रहे।
5-अंत में, समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए दिव्यांग अनुकूल सुविधाओं को अनिवार्य किया गया है, ताकि विशेष आवश्यकता वाली छात्राएं भी बिना किसी असुविधा के अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। ये पांचों कदम मिलकर देश की बेटियों के लिए एक गरिमापूर्ण और सुरक्षित भविष्य की नींव रखेंगे।
चुप्पी तोड़ो, गरिमा से जियो
अदालत ने अपने फैसले में जोर दिया कि ‘मेंस्ट्रुअल हाइजीन’ का सीधा संबंध महिला की गरिमा से है। जब एक छात्रा को स्कूल में सुरक्षित माहौल और सैनिटरी सुविधाएं मिलती हैं, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। ये फैसला केवल इंफ्रास्ट्रक्चर के बारे में नहीं है, बल्कि यह उस रूढ़िवादी सोच पर प्रहार है जो लड़कियों को उनके प्राकृतिक शारीरिक चक्र की वजह से पीछे धकेलती थी।
सुप्रीम कोर्ट का कहना है की “मासिक धर्म स्वास्थ्य केवल एक चिकित्सा मुद्दा नहीं है, यह एक छात्रा के स्कूल जाने और शिक्षा प्राप्त करने के सपने को सुरक्षित रखने का जरिया है।”
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