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सीटी की धुन से होती है यहां लोगों की पहचान! मेघालय के इस गांव में नाम नहीं, हर शख्स की है अपनी खास ‘धुन’, सदियों पुरानी है अनोखी परंपरा

शिलांग: भारत में हजारों गांव अपनी अलग-अलग परंपराओं और पहचान के लिए जाने जाते हैं, लेकिन मेघालय का कोंगथोंग गांव अपनी अनोखी संस्कृति के चलते खास है। यहां लोगों को पुकारने के लिए सामान्य नामों की जगह एक खास सीटी की धुन का इस्तेमाल किया जाता है। हर व्यक्ति की अपनी अलग ‘म्यूजिकल ट्यून’ होती है और उसी धुन से उसे आवाज दी जाती है। पहाड़ियों और घाटियों के बीच बसे इस गांव में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी स्थानीय जीवन का हिस्सा है।

मेघालय के पूर्वी खासी हिल्स में बसा है कोंगथोंग

कोंगथोंग गांव मेघालय के पूर्वी खासी हिल्स जिले में स्थित है। यह राज्य की राजधानी शिलांग से करीब 60 किलोमीटर दूर है। गांव में कदम रखते ही आसपास सीटी की अलग-अलग धुनें सुनाई दे सकती हैं। पहाड़ी इलाका होने के कारण इन धुनों की आवाज दूर तक पहुंचती है, जिससे लोगों को एक-दूसरे को बुलाने में आसानी होती है।

बच्चे के जन्म के बाद मां तय करती है उसकी खास धुन

कोंगथोंग की यह परंपरा बच्चे के जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है। बताया जाता है कि बच्चे की मां उसके लिए एक खास धुन बनाती है। इसी धुन के जरिए वह बच्चे को पुकारती है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, गांव के दूसरे लोग भी उसी धुन का इस्तेमाल कर उसे आवाज देने लगते हैं।

यह धुन सिर्फ किसी व्यक्ति को बुलाने का माध्यम नहीं मानी जाती, बल्कि इसे मां के स्नेह और बच्चे के प्रति उसके लगाव से भी जोड़ा जाता है।

‘जिंग्रवई लॉबेई’ कहलाती है यह खास धुन

कोंगथोंग में बच्चे के जन्म के बाद मां की ओर से तय की जाने वाली इस विशेष सीटी की धुन को ‘जिंग्रवई लॉबेई’ कहा जाता है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, पहाड़ी क्षेत्र में इस धुन की आवाज काफी दूर तक सुनाई दे सकती है। यही वजह है कि लोगों के लिए एक-दूसरे को बुलाने का यह तरीका बेहद उपयोगी भी है।

इसी वजह से पड़ा ‘व्हिसलिंग विलेज’ नाम

पीढ़ियों से चली आ रही इस अनोखी परंपरा के कारण कोंगथोंग को ‘व्हिसलिंग विलेज’ यानी ‘सीटी वाला गांव’ भी कहा जाता है। यहां सीटी बजाकर किसी को बुलाना केवल सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा भी है।

पहाड़ियों के बीच गूंजती अलग-अलग धुनें इस गांव को दूसरे इलाकों से अलग पहचान देती हैं। इसी अनोखी संस्कृति और प्राकृतिक माहौल को देखने-सुनने के लिए पर्यटकों की भी दिलचस्पी रहती है।

खासी जनजाति से जुड़े हैं गांव के लोग

कोंगथोंग में रहने वाले लोग खासी जनजाति से संबंधित हैं। यहां स्थानीय बातचीत के लिए खासी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे क्षेत्र की पारंपरिक भाषा माना जाता है। खासी संस्कृति और सीटी की इस अनोखी परंपरा ने कोंगथोंग को मेघालय के खास गांवों में शामिल कर दिया है।

vineet verma

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