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नेपाल फर्स्ट नीति के साथ बालेंद्र शाह का चीन और भारत को लेकर बड़ा फैसला,क्या बदलनी पड़ सकती है भारत को रणनीति ?

काठमांडू, 12 अप्रैल 2026। नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह (बालेन शाह) ने सत्ता संभालते ही विदेश नीति में बड़ा बदलाव दिखा दिया है। नई सरकार ने साफ संकेत दिया है कि अब नेपाल भारत और चीन दोनों को बराबरी का दर्जा देते हुए संतुलित नीति अपनाएगा। इसे भारत के लिए एक बड़ा कूटनीतिक संकेत माना जा रहा है, क्योंकि लंबे समय से नेपाल को भारत का खास पड़ोसी माना जाता रहा है। अब बालेन सरकार ‘समान दूरी’ की नीति पर जोर देती दिख रही है।

सत्ता में आने के कुछ ही दिनों बाद 8 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री शाह ने एक साथ 17 देशों के राजदूतों और कूटनीतिक प्रमुखों की बैठक बुलाई। इसमें भारत, चीन, अमेरिका, जापान समेत कई बड़े देश शामिल थे। नेपाल के इतिहास में यह पहली बार माना जा रहा है जब किसी प्रधानमंत्री ने इतने देशों के राजदूतों को सामूहिक रूप से संबोधित किया। राजनीतिक जानकार इसे नेपाल की विदेश नीति को ज्यादा स्वतंत्र, पारदर्शी और व्यावहारिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं।

भारत-चीन दोनों को बराबर महत्व

बैठक में बालेन शाह ने साफ कहा कि नेपाल की विदेश नीति विश्वास, पारस्परिक सम्मान और साझा समृद्धि पर आधारित होगी। उन्होंने पड़ोसी देशों सहित सभी मित्र राष्ट्रों के साथ रिश्ते मजबूत करने की बात कही, लेकिन किसी एक देश की तरफ झुकाव नहीं दिखाया। यही बात भारत के लिए चिंता का विषय मानी जा रही है, क्योंकि शाह सरकार ने संकेत दिया है कि नेपाल अब न पूरी तरह भारत की ओर झुकेगा और न चीन की ओर।

नई सरकार की सोच है कि नेपाल खुद को सिर्फ एक बफर स्टेट के तौर पर नहीं, बल्कि भारत और चीन के बीच आर्थिक पुल के रूप में स्थापित करे। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के विजन में भी नेपाल को “जीवंत पुल” बनाने की बात कही गई है। यानी अब फोकस सीमा राजनीति से ज्यादा व्यापार, निवेश और कनेक्टिविटी पर रहने वाला है।

भारत की कूटनीति के लिए नया संदेश

प्रधानमंत्री शाह ने पीएम नरेंद्र मोदी के बधाई संदेश का जवाब देते हुए भारत के साथ रिश्ते मजबूत रखने की बात जरूर कही, लेकिन साथ ही चीन को बराबर महत्व देने का संदेश भी साफ रहा। यही वजह है कि नई दिल्ली के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है।

बालेन शाह पहले काठमांडू के मेयर रह चुके हैं और उनकी छवि एक मजबूत राष्ट्रवादी नेता की रही है। मेयर रहते हुए उन्होंने कई बार “नेपाल फर्स्ट” का संदेश दिया था। अब प्रधानमंत्री बनने के बाद वे उसी सोच को विदेश नीति में भी उतारते दिख रहे हैं। नेपाली विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम नेपाल की विदेश नीति का एक तरह से रीसेट मोमेंट है, जहां राष्ट्रीय हित को सबसे ऊपर रखा जा रहा है।

इस नई नीति का असर आने वाले समय में सीमा विवाद, व्यापार, ऊर्जा सहयोग और चीन की परियोजनाओं पर भी दिख सकता है। भारत के लिए यह साफ संकेत है कि नेपाल के साथ पुरानी “विशेष संबंध” वाली रणनीति को अब नए दौर के हिसाब से ढालना पड़ सकता है। वहीं नेपाल इसे अपनी संप्रभुता और आत्मनिर्भरता की नई पहचान के तौर पर पेश कर रहा है।

news desk

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