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जंग ने छीनी लखनऊ चिकनकारी की चमक, सूने करघे, बुझते चूल्हे और उम्मीद की आखिरी डोर !

लखनऊ। नवाबों के शहर की पहचान सिर्फ उसकी तहज़ीब, अदब और इमामबाड़ों से नहीं है, बल्कि उन नाज़ुक धागों से भी है जो सफेद मलमल पर फूलों, बेलों और जालियों की शक्ल में उतरते हैं। यह ‘चिकनकारी’ सिर्फ एक हुनर नहीं, लखनऊ की रूह है। लेकिन इन दिनों इन धागों की चमक फीकी है और उनमें बेचैनी की गांठें पड़ी हुई हैं।

हजारों किलोमीटर दूर ईरान और अमेरिका के बीच मची जंग की गूँज आज पुराने लखनऊ की उन तंग गलियों में साफ़ सुनी जा सकती है, जहाँ कभी सुई-धागों की खनक हुआ करती थी। जिन हाथों ने दुनिया के बड़े-बड़े शो-रूम्स के लिए खूबसूरती बुनी, आज वही हाथ खाली हैं और बेबस भी।

धागों में उलझी हजारों परिवारों की सांसें

लखनऊ में करीब 3000 कारीगर परिवार ऐसे हैं जिनके घर का चूल्हा सिर्फ और सिर्फ सुई-धागे के भरोसे जलता है। लेकिन पिछले एक महीने से खाड़ी देशों (दुबई, कतर, ओमान) और अमेरिका जाने वाला एक्सपोर्ट लगभग ठप है। शहर के गोदामों में करीब 22 करोड़ रुपये का तैयार माल धूल फांक रहा है। हर बीतते दिन के साथ इस माल पर चढ़ती धूल की परत कारीगरों के माथे की लकीरों को गहरा कर रही है।

शांति देवी: बेबस उंगलियां और सूनी आंखें

चौपटिया की रहने वाली 60 वर्षीय शांति देवी पिछले 25 सालों से कपड़े पर ‘जादू’ उकेर रही हैं। लेकिन आज उनके माहिर हाथ कांप रहे हैं—बुढ़ापे से नहीं, बल्कि भविष्य की चिंता से।

शांति भारी मन से कहती हैं, “पहले तो फुर्सत नहीं मिलती थी, दिन भर हाथ चलते थे तो शाम को सुकून की रोटी नसीब होती थी। अब कई-कई दिन काम का इंतजार करना पड़ता है। बेटी की छोटी सी नौकरी न होती, तो शायद घर में चूल्हा भी न जलता।” शांति जैसी हजारों महिलाओं के लिए चिकनकारी सिर्फ कला नहीं, उनकी आर्थिक आजादी का एकमात्र जरिया थी, जिसे युद्ध की नजर लग गई है।

महंगाई और मंदी की दोहरी मार

चौक की सीमा की कहानी भी अलग नहीं है। उनके सामने युद्ध की खबरें नक्शे पर नहीं, बल्कि रसोई के बजट में दिख रही हैं। सीमा बताती हैं, “एक तरफ काम आधा रह गया है, दूसरी तरफ गैस सिलेंडर और राशन के दाम आसमान छू रहे हैं। बच्चे की स्कूल फीस भरूं या घर चलाऊं? समझ नहीं आता।”

चिकनकारी का अंतिम पड़ाव ‘रंगाई’ (Dyeing) करने वाले मोहम्मद फैज की अपनी अलग जंग है। वे बताते हैं कि रंगाई के लिए गैस की जरूरत होती है, जो अब या तो मिल नहीं रही या ‘ब्लैक’ में इतनी महंगी है कि काम की लागत भी नहीं निकल रही।

सन्नाटे में डूबे कारखाने और थमा ऑनलाइन बाजार

एक बड़े चिकन संस्थान की मैनेजर डॉली शुक्ला बताती हैं कि अकेले उनके यहां 20 लाख का माल रुका है। कारखानों में जहां कारीगरों की हंसी-ठिठोली हुआ करती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। यही हाल ऑनलाइन बाजार का भी है। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म चलाने वाली साक्षी के मुताबिक, जो सेल पहले लाखों में थी, वह अब कुछ हजार तक सिमट गई है। खरीदार तो हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय शिपमेंट की अनिश्चितता ने सबका भरोसा तोड़ दिया है।

सीज़फायर से क्या लौटेगी रौनक?

ईरान-अमेरिका के बीच हाल ही में हुए दो हफ्तों के सीज़फायर (युद्धविराम) ने उम्मीद की एक मध्यम सी लौ जरूर जलाई है। कारीगरों और व्यापारियों को उम्मीद है कि अगर यह शांति बनी रही, तो अटके हुए ऑर्डर फिर से निकलेंगे और गोदामों में बंद पड़ी खुशियां गलियों तक लौटेंगी।

हालाँकि, विशेषज्ञों का मानना है कि 80% तक गिर चुके इस कारोबार को पुराने रंग में लौटने में वक्त लगेगा।

उम्मीद की एक सुई

लखनऊ की चिकनकारी सिर्फ कपड़ों पर टांके नहीं, बल्कि उन हजारों महिलाओं और कारीगरों के ख्वाब हैं जो अपनी गरीबी को इस हुनर से ढंकते आए हैं। युद्ध चाहे सरहदों पर हो या समंदर पार, उसकी सबसे ज्यादा कीमत अक्सर वे चुकाते हैं जिनका राजनीति से कोई वास्ता नहीं होता।

आज पूरा लखनऊ बस यही दुआ कर रहा है कि यह सीज़फायर सिर्फ दो देशों के बीच की शांति न बने, बल्कि उन हाथों को भी फिर से काम दे, जो दुनिया के लिए ‘खूबसूरती’ बुनते हैं।

news desk

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