दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलावों के लिए पहचाने जाने वाले पूर्व मुख्य सचिव राकेश मेहता अब नहीं रहे। 1975 बैच के रिटायर्ड IAS अधिकारी राकेश मेहता ने नोएडा के सेक्टर-82 स्थित अपने किराए के फ्लैट में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। 75 वर्षीय मेहता के निधन ने दिल्ली के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
मौके से मिले एक पन्ने के सुसाइड नोट में उन्होंने अपनी खराब सेहत और मानसिक तनाव को अपनी मौत की वजह बताया है। नोट में उन्होंने हाइपरटेंशन, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और हाथ-पैरों में कंपन जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का जिक्र किया और किसी को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया।
लेकिन राकेश मेहता की कहानी सिर्फ उनकी मौत तक सीमित नहीं है। यह उस अफसर की कहानी है जिसने दिल्ली के सबसे अहम प्रशासनिक बदलावों में भूमिका निभाई और राजधानी को आधुनिक बनाने की कई बड़ी योजनाओं को जमीन पर उतारा।
उत्तराखंड के देहरादून से ताल्लुक रखने वाले राकेश मेहता पढ़ाई में भी बेहद मेधावी थे। उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से BA किया। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से MA और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) से MSc की डिग्री हासिल की।
साल 1975 में उनका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा में हुआ और उन्हें AGMUT यानी अरुणाचल प्रदेश-गोवा-मिजोरम-यूनियन टेरिटरीज कैडर मिला।
तीन दशक से ज्यादा के प्रशासनिक करियर में उन्होंने दिल्ली सरकार और नगर निगम समेत कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। साल 2007 से नवंबर 2010 तक वह दिल्ली के मुख्य सचिव रहे।
राकेश मेहता का नाम दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कार्यकाल में किए गए प्रशासनिक और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारों से जोड़ा जाता है।
उनके कार्यकाल में दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था, बिजली क्षेत्र और नगर प्रशासन में कई अहम बदलाव हुए।
एक दौर में दिल्ली की सड़कों पर दौड़ने वाली ब्लू लाइन बसें हादसों और तेज रफ्तार के लिए बदनाम थीं। इनके स्थान पर DTC की लो-फ्लोर बसों को लाने की प्रक्रिया में राकेश मेहता की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
दिल्ली में बिजली वितरण व्यवस्था में सुधार और निजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में भी उनका अहम योगदान माना जाता है। इसका मकसद राजधानी में बिजली आपूर्ति को अधिक भरोसेमंद बनाना था।
MCD कमिश्नर के तौर पर राकेश मेहता ने प्रॉपर्टी टैक्स के आकलन के लिए यूनिट एरिया सिस्टम लागू किया। इसका उद्देश्य संपत्ति कर व्यवस्था को ज्यादा पारदर्शी बनाना और भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम करना था।
दिल्ली में पर्यावरण सुधार से जुड़ी योजनाओं के लिए एयर एंबियंस फंड की स्थापना में भी उनकी भूमिका बताई जाती है। यह पहल आगे चलकर दिल्ली के पर्यावरण संबंधी कार्यों के लिए एक महत्वपूर्ण फंड के रूप में विकसित हुई।
राकेश मेहता के प्रशासनिक करियर का सबसे अहम दौर 2010 के दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों से जुड़ा रहा।
राष्ट्रमंडल खेलों से पहले दिल्ली में इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर कई सवाल उठ रहे थे। फ्लाईओवर, सड़कों, मेट्रो विस्तार और स्टेडियम से जुड़े कामों को समय पर पूरा करने की बड़ी चुनौती थी।
मुख्य सचिव के तौर पर मेहता ने प्रशासनिक मशीनरी को तेजी से काम करने के लिए आगे बढ़ाया। उनके साथ काम कर चुके अधिकारियों के मुताबिक, वह फाइलों को अनावश्यक रूप से लंबित रखने के पक्ष में नहीं थे।
कहा जाता है कि बैठकों के बाद लिए गए फैसलों को जल्द से जल्द अधिकारियों तक पहुंचाने पर उनका जोर रहता था, ताकि फैसलों को जमीन पर लागू करने में देरी न हो।
राकेश मेहता की निजी जिंदगी भी चर्चा में है। उनकी पत्नी सुमति मेहता भी रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं। उनका बेटा पीएचडी कर रहा है, जबकि उनकी बेटी लंदन में रहती हैं।
नवंबर 2010 में रिटायरमेंट के बाद कुछ समय तक वह परिवार के साथ रहे। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से वह नोएडा में अकेले रह रहे थे। परिवार के सदस्य उनसे मिलने आते-जाते थे।
यही वजह है कि उनकी मौत के बाद उनकी जिंदगी के आखिरी वर्षों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं-क्या प्रशासनिक जीवन में बेहद सक्रिय रहने वाला यह अधिकारी रिटायरमेंट के बाद अकेलेपन और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझ रहा था?
जानकारी के मुताबिक, शनिवार रात राकेश मेहता की पत्नी से फोन पर आखिरी बातचीत हुई थी। रविवार, 6 सितंबर को जब उनकी पत्नी ने कई बार फोन किया और कोई जवाब नहीं मिला, तो उन्होंने सोसाइटी के सुरक्षा कर्मी से फ्लैट पर जाकर देखने को कहा।
सुरक्षा कर्मी के फ्लैट में पहुंचने पर राकेश मेहता का शव मिला। इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई।
सोमवार शाम दिल्ली के लोधी रोड स्थित शवदाह गृह में उनका अंतिम संस्कार किया गया। मंगलवार को उनकी मौत की खबर सामने आई।
राकेश मेहता का प्रशासनिक करियर दिल्ली के उस दौर से जुड़ा है, जब राजधानी तेजी से बदल रही थी। बिजली व्यवस्था में सुधार, सार्वजनिक परिवहन के आधुनिकीकरण, MCD की टैक्स व्यवस्था और 2010 राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों जैसे कई बड़े फैसलों में उनका नाम सामने आता है।
लेकिन उनकी मौत ने एक दूसरा सवाल भी खड़ा किया है-क्या हमारी व्यवस्था उन अफसरों और कर्मचारियों की सेहत और मानसिक स्थिति पर भी उतना ही ध्यान देती है, जो दशकों तक सिस्टम का बोझ अपने कंधों पर उठाते हैं?
राकेश मेहता की मौत का दुख सिर्फ एक रिटायर्ड IAS अधिकारी के निधन का नहीं है। यह उस पीढ़ी के एक ऐसे प्रशासक के जाने की कहानी है, जिसने दिल्ली के बदलते दौर को करीब से देखा और उसमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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