नई दिल्ली। उन्नाव रेप कांड के दोषी और पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसके तहत सेंगर की उम्रकैद की सजा को निलंबित (सस्पेंड) कर उसे राहत दी गई थी। शीर्ष अदालत के इस कड़े रुख के बाद अब सेंगर को फिलहाल जेल में ही रहना होगा।
CJI की टिप्पणी: ‘मेरिट नहीं, कानूनी प्रक्रिया सर्वोपरि’
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए स्पष्ट किया कि अदालत फिलहाल केस की मेरिट (गुण-दोष) पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है, लेकिन कुछ ऐसे कानूनी सवाल हैं जिनका समाधान जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट को कड़े निर्देश देते हुए कहा है कि:
- मुख्य अपील पर सुनवाई संभव हो तो गर्मी की छुट्टियों से पहले पूरी की जाए।
- किसी भी हाल में दो महीने (60 दिन) के भीतर अंतिम फैसला लिया जाए।
- यदि अपील पर जल्द सुनवाई नहीं होती, तब सजा निलंबन की अर्जी पर नए सिरे से विचार हो।
क्या ‘लोक सेवक’ की परिभाषा बदलेगी?
इस सुनवाई के दौरान एक बड़ा कानूनी सवाल भी उठा जिसने सबका ध्यान खींचा। कोर्ट में इस पर बहस हुई कि क्या किसी विधायक को पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ (लोक सेवक) माना जा सकता है? इस सवाल का जवाब भविष्य में जनप्रतिनिधियों से जुड़े आपराधिक मामलों के लिए नजीर साबित हो सकता है।
पक्ष-विपक्ष की दलीलें
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपनी धारदार दलीलें पेश कीं:
- सीबीआई (CBI): सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखते हुए कहा कि एजेंसी की अपील हाईकोर्ट में पहले से लंबित है और इस मामले में सजा का निलंबन न्यायोचित नहीं है।
- सेंगर का पक्ष: वरिष्ठ वकील एन. हरीहरन ने दावा किया कि पीड़िता घटना के समय नाबालिग नहीं थी और एम्स (AIIMS) मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट उनके मुवक्किल के पक्ष में है।
क्यों अहम है यह मोड़?
कुलदीप सेंगर को निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट से मिली अंतरिम राहत पीड़िता के पक्ष के लिए एक बड़ा झटका मानी जा रही थी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है। अब गेंद एक बार फिर दिल्ली हाईकोर्ट के पाले में है, जिसे समयबद्ध तरीके से इस संवेदनशील मामले का निपटारा करना होगा।