प्रयागराज: समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहम्मद आजम खान के खिलाफ चल रहे मामलों में शुक्रवार को बड़ा मोड़ आ गया, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस समीर जैन ने अचानक खुद को सभी लंबित केसों से अलग कर लिया. इसमें 2016 का चर्चित यतीमखाना बेदखली केस भी शामिल है, जिसमें आजम पर गरीबों की बस्ती खाली कराने और ज़बरदस्ती हटवाने के गंभीर आरोप हैं. जस्टिस जैन की बेंच में आजम से जुड़े कुल चार मामले चल रहे थे, लेकिन उन्होंने बिना कोई कारण बताए रेक्यूजल का ऐलान कर दिया.
क्या न्यायपालिका पर दबाव बनाया जा रहा है ?
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार पर विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के आरोप लगातार लगते रहे हैं. सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार न्यायपालिका पर दबाव बनाकर विरोधी नेताओं के खिलाफ सख्त फैसले हासिल करने की कोशिश कर रही है? जस्टिस जैन ने पहले आजम खान को कई मामलों में राहत दी थी और अब उनका अचानक पीछे हटना कई अंदेशों को जन्म दे रहा है.
2016 के यतीमखाना प्रकरण में आरोप है कि आजम खान, जो उस समय मंत्री थे, ने जोहर यूनिवर्सिटी के लिए जमीन खाली कराने के लिए बस्ती को तुड़वाया. 2019-20 में इस मामले में 12 FIR दर्ज हुईं. अगस्त 2024 में स्पेशल MP/MLA कोर्ट ने इन सभी FIR को एक मुकदमे में जोड़ दिया. मई 2025 में गवाहों की दोबारा गवाही और वीडियो फुटेज की जांच की मांग खारिज हुई, जिसे आजम ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. जून 2025 से सुनवाई जस्टिस जैन की बेंच में चल रही थी और ट्रायल कोर्ट के फैसले पर रोक भी लगी थी.
क्यों चर्चा में है जस्टिस जैन का रेक्युजल ?
जस्टिस जैन का हटना इसलिए और चर्चा में है क्योंकि उन्होंने पहले डूंगरपुर बेदखली केस और कई अन्य भूमि मामलों में आजम को राहत दी थी. इसी बेंच ने अब्बास अंसारी की सजा पर भी रोक लगाई थी, जिससे उनकी विधायकी बच गई. विपक्ष का आरोप है कि योगी सरकार राजनीतिक बदले की भावना से विपक्षी नेताओं पर केस दर्ज कर रही है.
हालांकि रेक्यूजल का कारण आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है, लेकिन इसकी टाइमिंग कई सवाल खड़े कर रही है. विपक्ष इसे “लोकतंत्र पर हमला” बता रहा है, जबकि BJP का कहना है कि कानून सबके लिए बराबर है. असल वजह क्या है, यह अभी भी प्रश्नों के घेरे में है.