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Jharkhand Student Protest: पिता शिबू सोरेन की तस्वीर लेकर बेटे हेमंत के खिलाफ क्यों उतरे छात्र? समझिए पूरा विवाद

रांची में 10 अगस्त को हुए छात्र आंदोलन ने झारखंड की राजनीति में एक ऐसी तस्वीर पेश की, जिसने सबका ध्यान खींचा। हजारों युवा हाथों में तिरंगा लेकर विधानसभा की ओर बढ़ रहे थे और उनके बीच एक तस्वीर बार-बार दिखाई दे रही थी—झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की।

दिलचस्प बात यह थी कि प्रदर्शन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार के खिलाफ था और शिबू सोरेन उनके पिता हैं। ऐसे में सवाल उठा कि आखिर जिनके बेटे की सरकार का विरोध हो रहा है, उन्हीं की तस्वीर लेकर छात्र सड़कों पर क्यों उतरे?

17 दिनों से जारी है छात्रों का आंदोलन

झारखंड में JPSC और JSSC की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्र और सरकारी नौकरी के अभ्यर्थी करीब 17 दिनों से आंदोलन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में JSSC-CGL परीक्षा रद्द करना, परीक्षा में कथित गड़बड़ियों की CBI जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई शामिल है।

9 अगस्त को सरकार और छात्रों के बीच करीब छह घंटे तक बातचीत हुई। इसके बाद 14वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा की प्रारंभिक परीक्षा रद्द करने पर सहमति बनी। JPSC के तीनों सदस्यों ने भी इस्तीफा दे दिया।

लेकिन छात्रों का आंदोलन खत्म नहीं हुआ। उनका कहना है कि JSSC-CGL समेत बाकी मुद्दों पर भी सरकार को ठोस फैसला लेना होगा।

हेमंत सोरेन के जन्मदिन पर विधानसभा मार्च

10 अगस्त को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का 51वां जन्मदिन था। इसी दिन छात्रों ने विधानसभा घेराव का ऐलान किया।

पुराने विधानसभा परिसर से करीब 10 बजे शुरू हुआ मार्च लगभग तीन किलोमीटर आगे जगन्नाथपुर मंदिर के पास पहुंचा। यहां पुलिस ने कई स्तरों पर बैरिकेडिंग कर रखी थी। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव बढ़ा और बैरिकेडिंग तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश की गई।

इसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज, पानी की बौछार और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। प्रदर्शनकारी भी पीछे हटने को तैयार नहीं हुए।

एंबुलेंस से पहुंचे देवेंद्र महतो, हाथ में थी शिबू सोरेन की तस्वीर

इस आंदोलन का सबसे चर्चित चेहरा झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के नेता देवेंद्र नाथ महतो रहे। वह पिछले नौ दिनों से अनशन पर थे और इस दौरान उनका वजन करीब 10.5 किलो कम होने का दावा किया गया।

चलने में असमर्थ होने के बावजूद महतो एंबुलेंस से विधानसभा मार्च में पहुंचे। उनके हाथ में शिबू सोरेन की तस्वीर थी।

यहीं से पूरे आंदोलन का राजनीतिक और भावनात्मक संदेश साफ दिखाई देने लगा।

‘गुरुजी जिंदा होते तो हमारे साथ होते’

शिबू सोरेन की तस्वीर लेकर मार्च करने के सवाल पर देवेंद्र महतो ने कहा कि गुरुजी ने पूरी जिंदगी संघर्ष और आंदोलन में बिताई। उनके मुताबिक, अगर शिबू सोरेन आज जीवित होते तो वह छात्रों के इस आंदोलन में उनके साथ खड़े होते।

महतो ने इसके बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर इशारा करते हुए सवाल खड़ा किया कि अगर हेमंत सोरेन अपने पिता को आदर्श मानते हैं, तो सरकार छात्रों की मांगों को क्यों नहीं मान रही?

यानी प्रदर्शनकारियों ने शिबू सोरेन की विरासत को ही सरकार के सामने एक नैतिक सवाल के रूप में खड़ा कर दिया।

शिबू सोरेन की विरासत बनी आंदोलन का हथियार

शिबू सोरेन झारखंड के आदिवासी आंदोलन के प्रमुख नेताओं में रहे हैं। उन्होंने 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की और झारखंड राज्य आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे।

उन्हें ‘दिशोम गुरु’ के नाम से भी जाना जाता है। उनकी राजनीति को जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अधिकारों के संघर्ष से जोड़कर देखा जाता है।

यही वजह है कि आंदोलनकारी शिबू सोरेन की तस्वीर को सिर्फ एक राजनीतिक चेहरे के रूप में इस्तेमाल नहीं कर रहे, बल्कि उनकी विरासत और संघर्ष के प्रतीक के तौर पर पेश कर रहे हैं।

पिता का सम्मान, बेटे की सरकार का विरोध

इस आंदोलन की सबसे दिलचस्प बात यही है कि छात्रों ने शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन के बीच एक राजनीतिक अंतर खींचने की कोशिश की है।

रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में शिबू सोरेन के बड़े कटआउट लगाए गए। प्रदर्शनकारियों ने उनके संघर्ष को याद करते हुए मौजूदा सरकार पर युवाओं के मुद्दों को लेकर सवाल उठाए।

एक तरह से आंदोलनकारियों का संदेश यह है कि वे शिबू सोरेन के संघर्ष और आदर्शों का सम्मान करते हैं, लेकिन हेमंत सोरेन सरकार की नीतियों और परीक्षा व्यवस्था से असहमत हैं।

यानी शिबू सोरेन की विरासत को हेमंत सरकार के खिलाफ नैतिक दबाव के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

विपक्ष भी आंदोलन के समर्थन में

छात्र आंदोलन को लेकर झारखंड की राजनीति भी गरमा गई है। विपक्ष के नेता बाबूलाल मरांडी और बीजेपी नेता आदित्य साहू को मुख्यमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई।

बाबूलाल मरांडी ने JPSC, JSSC और CGL से जुड़े मामलों की CBI जांच की मांग की।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी छात्रों पर बल प्रयोग को गलत बताया।

हेमंत सोरेन ने क्या कहा?

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने छात्रों से बातचीत की अपील की। उन्होंने कहा कि समस्याओं का समाधान संवाद से होना चाहिए, लाठी-डंडे और बंदूक से नहीं।

सरकार की ओर से JPSC परीक्षा रद्द करने और आयोग के सदस्यों के इस्तीफे के बाद भी छात्रों का आंदोलन जारी रहना बताता है कि मामला अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। झारखंड का छात्र आंदोलन अब सिर्फ परीक्षा में कथित गड़बड़ियों तक सीमित नहीं दिख रहा। शिबू सोरेन की तस्वीरों और ‘गुरुजी की विरासत’ के इस्तेमाल ने इसे एक बड़े राजनीतिक और भावनात्मक मुद्दे का रूप दे दिया है।

अब सरकार के सामने दोहरी चुनौती है-एक तरफ छात्रों की बची हुई मांगों का समाधान करना और दूसरी तरफ आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देना।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हेमंत सोरेन सरकार छात्रों को JSSC-CGL और CBI जांच जैसी मांगों पर कोई ठोस आश्वासन देकर आंदोलन खत्म करा पाएगी, या शिबू सोरेन की विरासत आने वाले दिनों में सरकार के खिलाफ छात्र आंदोलन का बड़ा प्रतीक बन जाएगी?

news desk

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