वॉशिंगटन/तेहरान। किसी भी चीज़ की ‘अति’ अंततः विनाशकारी होती है। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ इसी ‘अति’ की सीमा को लांघा, जिसका परिणाम आज पूरी दुनिया के सामने है।
जिस तेहरान को मिटाने की धमकी दी गई थी, वही आज अमेरिका की कूटनीतिक हार का केंद्र बन गया है। ईरान की घेराबंदी करने और उसे घुटनों पर लाने का अति-उत्साह अब अमेरिका पर ही भारी पड़ रहा है। आलम यह है कि न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा गई है, बल्कि NATO जैसे पुराने दोस्तों ने भी इस ‘अति’ को भांपते हुए अमेरिका से किनारा कर लिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के इस आक्रामक रुख के पीछे इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की रणनीति थी। इजरायल को अंदेशा था कि ईरान जल्द ही परमाणु हथियार हासिल कर लेगा। ‘लोकतंत्र की बहाली’ और ‘रिजीम चेंज’ के पुराने अमेरिकी फॉर्मूले को एक बार फिर आजमाया गया, लेकिन इस बार ईरान की 30-स्तरीय सैन्य प्रणाली (IRGC) ने अमेरिका की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
ट्रंप के लिए सबसे बड़ा झटका यूरोप से आया। स्पेन के पेड्रो सांचेज के नेतृत्व में ब्रिटेन, इटली और फ्रांस (मैक्रों) ने साफ कह दिया कि यह युद्ध अमेरिका का व्यक्तिगत फैसला था। जब ट्रंप ने होर्मुज खुलवाने के लिए नाटो को याद किया, तो सहयोगियों ने मदद से इनकार कर दिया। यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका के ‘अकेले पड़ने’ की शुरुआत मानी जा रही है।
पेंटागन ने इस अभियान के लिए $200 अरब का अतिरिक्त बजट मांगा है। यह राशि कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह पाकिस्तान जैसे कर्ज में डूबे देश की कुल जीडीपी के 12-15% के बराबर है। एक फाइटर पायलट को बचाने के लिए अमेरिका ने करोड़ों डॉलर के हेलिकॉप्टर और संसाधन गंवाए, जिसने ‘सुपरपावर’ की सैन्य दक्षता पर भी सवाल खड़े कर दिए।
ईरान ने इस युद्ध को केवल सैन्य नहीं बल्कि ‘सभ्यता’ की लड़ाई बना दिया। जब ट्रंप ने ईरानी विरासत को मिटाने की धमकी दी, तो तेहरान ने अपने इतिहास का हवाला देते हुए कहा—”सिकंदर और मंगोल भी हमें नहीं मिटा पाए, तो कोई व्यक्ति क्या मिटाएगा।” अंततः 8 अप्रैल की सुबह ट्रंप को ईरान की शर्तों पर सीजफायर (युद्धविराम) के लिए तैयार होना पड़ा। भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में इस घटना को ट्रंप की बड़ी कूटनीतिक हार के रूप में देखा जा रहा है।
ट्रंप की इस कोशिश को स्थानीय भाषा में “जातो गंवाए, भातो न खाए” वाली स्थिति कहा जा सकता है। यानी मकसद भी पूरा नहीं हुआ, आर्थिक चपत भी लगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साख को भी गहरा धक्का पहुंचा।
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