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ईरान में हालात बेकाबू: मस्जिद जलाने से लेकर ट्रंप की धमकी तक, तस्वीरों में देखें महिलाओं ने खामेनेई की तस्वीरों से कैसे जलाई सिगरेट

ईरान इन दिनों जबरदस्त उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। आर्थिक संकट, बेलगाम महंगाई और लगातार कमजोर होती रियाल के खिलाफ शुरू हुए राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन अब दूसरे हफ्ते में भी पूरी ताकत के साथ जारी हैं। शुरुआत भले ही रोजमर्रा की परेशानियों से हुई हो, लेकिन अब यह आंदोलन सीधे सत्ता और व्यवस्था को चुनौती देता नजर आ रहा है।

9 जनवरी 2026 को सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई ने प्रदर्शनकारियों पर सख्त रुख अपनाते हुए उन्हें “विदेशी एजेंट” बताया और देश को एकजुट रहने की अपील की। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ईरानियों के खून से हाथ रंगे होने का आरोप लगाया। जवाब में ट्रंप ने भी ईरान को “बड़ी मुसीबत” में बताया और चेतावनी दी कि अगर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलीं, तो अमेरिका हस्तक्षेप कर सकता है। इस तीखी बयानबाज़ी ने हालात को और भड़का दिया है।

सड़कों पर गुस्सा, सत्ता पर सवाल

अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, विरोध को दबाने के लिए सरकार ने पूरे देश में इंटरनेट ब्लैकआउट लागू कर रखा है, ताकि प्रदर्शनकारी एक-दूसरे से जुड़ न सकें। इसके बावजूद हालात काबू में नहीं आ रहे। बीते दो हफ्तों में दर्जनों प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों की मौत की खबरें सामने आई हैं। तेहरान समेत कई शहरों में झड़पें, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। जो आंदोलन कभी महंगाई तक सीमित था, वह अब राजनीतिक बदलाव की मांग में तब्दील हो चुका है।

महिलाओं के विरोध का अनोखा तरीका

इसी बीच विरोध प्रदर्शनों में गुस्से का एक नया और चौंकाने वाला रूप भी देखने को मिल रहा है। कई जगहों पर महिलाएं सुप्रीम लीडर खामेनेई की तस्वीरें जला रही हैं और उसी आग से सिगरेट सुलगाती नजर आ रही हैं। यह दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और आर्थिक बदहाली, कमजोर मुद्रा, महंगाई और सरकारी दमन के खिलाफ जनता के उबाल का प्रतीक बन गया है। दिसंबर 2025 के अंत से शुरू हुए ये प्रदर्शन अब खामेनेई के शासन के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती माने जा रहे हैं। इंटरनेट और टेलीफोन ब्लैकआउट के बावजूद लोग सड़कों पर उतरकर नारे लगा रहे हैं।

मस्जिदों में आग और शाही झंडों की वापसी

तेहरान के पॉश इलाके सादात अबाद में हालात और भी विस्फोटक हो गए, जब 8-9 जनवरी की रात भीड़ ने अल रसूल मस्जिद को आग के हवाले कर दिया। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने वहां शेर-सूरज वाला पारंपरिक शाही झंडा भी लहराया, जो 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले की राजशाही का प्रतीक माना जाता है। इससे साफ संकेत मिला कि विरोध अब सिर्फ महंगाई के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे इस्लामी गणराज्य के खिलाफ खुली बगावत का रूप ले चुका है। वीडियो फुटेज में जलती मस्जिद के पास “ईरान, ईरान” के नारे लगाते लोग दिखाई दिए, जबकि अन्य शहरों में बैंक, वाहन और सरकारी इमारतें भी निशाने पर रहीं।

सरकार इन घटनाओं को विदेशी साजिश करार दे रही है, जबकि प्रदर्शनकारी इसे अपने भविष्य और आज़ादी की लड़ाई बता रहे हैं। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने भले ही संयम बरतने और लोगों की “वास्तविक शिकायतों” को सुनने की बात कही हो, लेकिन शीर्ष न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ अधिकारी सख्त कार्रवाई की चेतावनी दे चुके हैं। दिसंबर के अंत में दुकानदारों की हड़ताल से शुरू हुआ यह आंदोलन अब 100 से ज्यादा शहरों तक फैल चुका है और इसे बीते तीन वर्षों का सबसे बड़ा जन आंदोलन माना जा रहा है।

पश्चिमी प्रतिबंधों, करीब 40 प्रतिशत महंगाई और पिछले साल हुए इजराइल-अमेरिका हमलों का असर अब खुलकर सड़कों पर दिख रहा है। हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं और हिंसा बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। साफ है कि ईरान का यह संकट फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा।

news desk

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