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जनप्रतिनिधि अच्छे हैं लेकिन सिस्टम में सुधार चाहिए, इंटरनेशनल सर्वे में भारतीयों को लेकर हुआ चौंकाने वाला खुलासा!

द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा किए गए एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे ने भारतीय राजनीति को लेकर लोगों की सोच पर दिलचस्प तस्वीर पेश की है. यह सर्वे 25 देशों में किया गया था, जिसमें लोगों से उनकी राजनीतिक व्यवस्था और नेताओं के बारे में राय पूछी गई.

सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि भारत में 70% से अधिक लोगों ने माना कि देश की राजनीतिक व्यवस्था में बड़े बदलाव की आवश्यकता है. इनमें से 34% लोगों का मानना है कि सुधार आधे-अधूरे नहीं, बल्कि पूरी तरह से होने चाहिए. यह दर्शाता है कि भारतीय नागरिक मौजूदा ढांचे से संतुष्ट नहीं हैं और वे एक नई, अधिक पारदर्शी व प्रभावी प्रणाली चाहते हैं.
लेकिन इस असंतोष का रोचक पहलू यह है कि भारत की जनता अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक दृष्टिकोण रखती है. सर्वे के अनुसार, दो-तिहाई से अधिक भारतीय मानते हैं कि उनके नेता ईमानदार, नैतिक और योग्य हैं. केवल तीन में से एक व्यक्ति ने अपने नेताओं को नकारात्मक रूप से आँका. यह स्थिति जापान और नीदरलैंड्स जैसे देशों से बिल्कुल अलग है, जहाँ नेताओं के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण अधिक है लेकिन सुधार की मांग कमज़ोर है.
दूसरे देशों की तुलना में भारतीय नागरिकों में एक और खास बात देखने को मिली. जहाँ दक्षिण कोरिया जैसे देशों में 87% लोगों ने सुधार की ज़रूरत तो जताई, लेकिन आधे से अधिक लोगों को इस पर भरोसा नहीं कि बदलाव संभव है, वहीं भारतीयों में बदलाव की संभावना पर विश्वास सबसे अधिक पाया गया. यानी भारतीय न केवल सुधार की इच्छा रखते हैं, बल्कि उन्हें विश्वास भी है कि यह सुधार लाया जा सकता है.

इस सर्वे से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज राजनीति को नेताओं के व्यक्तित्व तक सीमित करके नहीं देखता, बल्कि व्यवस्था की खामियों को असली चुनौती मानता है. शायद यही कारण है कि जनता अपने नेताओं को ईमानदार मानने के बावजूद प्रणालीगत बदलाव की माँग करती है.

भारतीय लोकतंत्र का यह विरोधाभास देश की राजनैतिक व्यवस्था में उम्मीद और चुनौती दोनों को पेश करता है. एक ओर जनता अपने नेताओं पर भरोसा रखते हुए बदलाव की माँग करती है, जो लोकतांत्रिक चेतना की परिपक्वता को दर्शाता है ,तो वहीं दूसरी ओर, यदि इन उम्मीदों के अनुरूप सुधार समय पर नहीं हुए तो यही भरोसा मोहभंग में भी बदल सकता है. इसलिए ज़रूरी हो जाता है किसी देश का लोकतंत्र केवल विश्वास और आशा पर नहीं, बल्कि ठोस सुधार और जवाबदेही की ठोस कार्यवाहियों पर टिका रहे, जिससे जनता का विश्वास भविष्य के लिए सकारात्मक ऊर्जा बदल सके.

news desk

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