अमेरिका से तेल आयात बढ़ाने की तैयारी
नई दिल्ली: मोदी सरकार अमेरिका से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के आयात को तेजी से बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है, लेकिन इस फैसले को लेकर सियासी और आर्थिक बहस तेज हो गई है। विपक्षी दलों और कई आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रूस से मिलने वाले सस्ते तेल की खरीद कम होती है, तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता की जेब पर पड़ेगा।
सूत्रों के मुताबिक, हाल ही में राज्य-संचालित रिफाइनरियों और गैस मार्केटिंग कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने तेल मंत्रालय के साथ बैठक कर अमेरिका से अतिरिक्त आयात की संभावनाओं पर चर्चा की। यह कदम भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत उठाया जा रहा है, जबकि रूस से तेल आपूर्ति में कमी की संभावना जताई जा रही है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि रूसी तेल पर भारत को ब्रेंट के मुकाबले करीब 16 डॉलर प्रति बैरल तक का डिस्काउंट मिलता रहा है। अगर यह छूट खत्म होती है, तो भारत का सालाना आयात बिल 9–11 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। इससे रिफाइनरियों की लागत बढ़ेगी और अंततः पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर आम उपभोक्ताओं पर दिखाई दे सकता है। साथ ही, अमेरिकी तेल की शिपिंग लागत भी पश्चिम एशिया की तुलना में अधिक होती है, जिससे खर्च और बढ़ने की आशंका है।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार अमेरिका पर ऊर्जा निर्भरता बढ़ाकर रूस जैसे पुराने रणनीतिक सहयोगी से दूरी बना रही है, जिसका असर रक्षा और भू-राजनीतिक संबंधों पर भी पड़ सकता है। हालांकि सरकार का तर्क है कि ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण (डाइवर्सिफिकेशन) देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2025 की अमेरिका यात्रा के बाद यह लक्ष्य तय किया गया था कि अमेरिका से ऊर्जा आयात को करीब 15 अरब डॉलर से बढ़ाकर 25 अरब डॉलर तक पहुंचाया जाएगा। अब देखना यह होगा कि इस रणनीति से देश को दीर्घकाल में फायदा मिलता है या बढ़ती लागत और महंगाई को लेकर उठ रही आशंकाएं सच साबित होती हैं।
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