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अयनी एयरबेस से भारत का हटना चीन या रूस की साजिश! हंबनटोटा से लेकर अयनी तक क्यों भारत खोता जा रहा है एशिया में अपने स्ट्रैटेजिक बेस ?

नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों में ठंडेपन के बीच एक ऐसी खबर आई है जो भारत के रणनीतिक सुरक्षा और एशिया में दबदबे पर सवाल उठा रही है. भारत को एक और बड़ा कूटनीतिक झटका उस वक्त लगा जब मध्य एशिया का एक बड़ा स्ट्रैटिजिक प्वाइंट भारत के हाथ से निकल गया.

हम बात कर रहे हैं ताजिकिस्तान स्थित अयनी एयरबेस की, जो कभी भारत की विदेश नीति और सामरिक शक्ति का प्रतीक माना जाता था, अब इतिहास बन चुका है. यह वही ठिकाना था जिसने भारत को मध्य एशिया में एक मजबूत भू-रणनीतिक बढ़त दी थी. मगर अब स्थिति बदल चुकी है. हाल ही में खबर आई है कि भारत ने तजाकिस्तान स्थित अयनी एयरबेस से वापसी कर ली है.

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ताजिकिस्तान सरकार ने 2021 में ही भारत को सूचित कर दिया था कि एयरबेस की लीज़ अवधि आगे नहीं बढ़ाई जाएगी. इसके बाद भारतीय सैनिकों और उपकरणों की वापसी शुरू हो गई थी. यह वही एयरबेस था जिसे भारत ने 2002 से विकसित करना शुरू किया था और लगभग करीब 500 से 800 करोड़ रुपये के बीच निवेश किया था. पहले बाजपेयी सरकार फिर मनमोहन सिंह सरकार ने अयनी एयरबेस पर मजबूत किलेबंदी की थी.

क्या रूस-चीन के दबाव में आई ताजिकिस्तान सरकार ?

माना जा रहा है कि तजाकिस्तान के इस कदम के पीछे रूस और चीन का भारी दबाव था. चीन अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी बीआरआई के ज़रिए पहले ही इस क्षेत्र में गहरी पकड़ बना चुका था, जबकि रूस मध्य एशिया में किसी दूसरी शक्ति के बढ़ते प्रभाव के पक्ष में नहीं था. ऐसे में भारत की उपस्थिति दोनों देशों को असहज कर रही थी. फिलहाल तो यही माना जा रहा है कि चीन और रूस के दवाब में भारत को वहां से रणनीतिक रूप से पीछे हटना पड़ा.

रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम न केवल भारत की केंद्रीय एशिया में सैन्य पहुंच को सीमित करता है, बल्कि दक्षिण एशिया से लेकर अफगानिस्तान तक भारत की भू-राजनीतिक स्थिति पर भी असर डालता है.

विपक्ष ने भारत सरकार की विदेश नीति पर उठाये सवाल

अब इस मुद्दे पर विपक्ष ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया है. कांग्रेस नेता कनन गोपीनाथन ने एक्स पर पोस्ट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे सवाल किया है कि, ‘भारत की दो विदेशी सैन्य मौजूदगियां थीं. मालदीव में हमारी सेना की जगह अब चीनी सैन्य सहायता ने ले ली है. ताजिकिस्तान में उन्होंने भारत की बजाय रूस-चीन का साथ चुना है. केंद्रीय एशिया से लेकर हिंद महासागर तक हमारी शक्ति-संतुलन की इस रणनीतिक पीछे हटने की ज़िम्मेदारी आखिर कौन लेगा ?.

हंबनटोटा से लेकर अयनी तक भारत ने खोई अपनी रणनीतिक स्थिति!

यह कोई पहला मौका नहीं जब भारत अपने विदेशी रणनीतिक झटका लगा है. इससे पहले श्रीलंका ने भारत के ऊपर चीन को प्राथमिकता देते हुए हंबनटोटा बंदरगाह चीन को दे दिया, ईरान के चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट की रफ्तार सुस्त पड़ी, मलेशिया के साथ कूटनीतिक दूरी बढ़ी और अब ताजिकिस्तान से अयनी एयरबेस का जाना भारत के लिए बड़ा रणनीतिक झटका है.

क्या भारत की विदेश नीति रही नाकाम ?

विश्लेषकों का मानना है कि “वसुधैव कुटुंबकम” की भावनात्मक नीति अब ठोस रणनीतिक परिणाम नहीं दे पा रही. भारत को न सिर्फ पड़ोसी देशों, बल्कि मध्य एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में भी अपनी प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए पुनः आकलन की जरूरत है.
अयनी एयरबेस से भारत की वापसी केवल एक सैन्य निर्णय नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि नई दिल्ली को अपनी विदेश नीति में प्रतीकात्मक मित्रता से आगे बढ़कर रणनीतिक दृढ़ता दिखाने की आवश्यकता है. वरना, आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया से लेकर सेंट्रल एशिया तक भारत की पकड़ कमजोर पड़ती जाएगी, और चीन-रूस का गठजोड़ भारत की कूटनीतिक चौखट को और संकुचित कर देगा.

news desk

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