चीनी कंपनियों पर पाबंदी हटाने की तैयारी
भारत सरकार चीन के साथ कारोबारी रिश्तों को लेकर अब कुछ नरम रुख अपनाती नजर आ रही है। सूत्रों के मुताबिक वित्त मंत्रालय 2020 में लगाई गई उन सख्त पाबंदियों को हटाने पर विचार कर रहा है, जिनकी वजह से चीनी कंपनियां गवर्नमेंट कॉन्ट्रैक्ट्स की दौड़ से लगभग बाहर हो गई थीं। गलवान घाटी की घटना के बाद सरकार ने नियम बनाया था कि किसी भी चीनी कंपनी को भारत में सरकारी टेंडर लेने से पहले एक विशेष समिति में रजिस्ट्रेशन कराना होगा और राजनीतिक व सुरक्षा मंजूरी भी लेनी होगी। इन नियमों के चलते 700 से 750 अरब डॉलर तक के सरकारी प्रोजेक्ट्स में चीनी कंपनियां हिस्सा नहीं ले सकीं।
अब खबर है कि इन नियमों को आसान किया जा सकता है और रजिस्ट्रेशन वाली शर्त हटाने पर काम चल रहा है, हालांकि अंतिम फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय को लेना है। सरकार की ओर से अभी इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। इन पाबंदियों का असर भी साफ दिखा था—कई प्रोजेक्ट्स में देरी हुई, कुछ सेक्टरों में सामान की कमी आई और चीनी कंपनियों को मिलने वाले नए प्रोजेक्ट्स की वैल्यू में तेज गिरावट दर्ज की गई। खासकर बिजली सेक्टर में जरूरी उपकरणों की सप्लाई रुकने से भारत की भविष्य की पावर क्षमता योजनाएं भी प्रभावित हुईं।
इधर, भारत-चीन के बीच सीमा पर तनाव कुछ कम होने और रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार के बीच सरकार आर्थिक मोर्चे पर संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है, हालांकि चीनी कंपनियों से जुड़ी एफडीआई पाबंदियां फिलहाल बनी हुई हैं। इस पूरे मामले पर कांग्रेस ने मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस ने ट्वीट कर कहा कि जिस चीन के साथ संघर्ष में गलवान में
20 भारतीय सैनिक शहीद हुए, उसी चीन की कंपनियों को अब सरकारी कॉन्ट्रैक्ट देने की तैयारी हो रही है। पार्टी ने प्रधानमंत्री मोदी के उस पुराने बयान को भी याद दिलाया, जिसमें उन्होंने “कोई घुसपैठ नहीं हुई” कहा था। कांग्रेस का आरोप है कि ‘लाल आंखें’ दिखाने की बात करने वाली सरकार अब चुपचाप चीन के लिए रास्ता साफ कर रही है और सवाल उठाया कि आखिर भारत के खिलाफ खड़े रहे चीन को इतना फायदा क्यों दिया जा रहा है।
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