नई दिल्ली: आपने अपनी मेहनत की कमाई से फ्लैट खरीदा, उसका रजिस्ट्रेशन कराया और नियमित रूप से सोसाइटी का मेंटेनेंस भी भर रहे हैं। लेकिन अगर एक दिन सोसाइटी के लोग आपके खिलाफ प्रस्ताव पास कर दें और घर खाली करने या फ्लैट बेचने के लिए कहें तो क्या आपको वाकई अपनी ही प्रॉपर्टी छोड़नी पड़ेगी? इसका सीधा जवाब है- नहीं। सिर्फ प्रस्ताव पारित करके कोई हाउसिंग सोसाइटी किसी कानूनी मालिक को उसके फ्लैट से बेदखल नहीं कर सकती।
हाल ही में महाराष्ट्र कोऑपरेटिव अपीलीय कोर्ट में ऐसा ही मामला सामने आया था। एक हाउसिंग सोसाइटी ने एक निवासी को बाहर निकालने का प्रस्ताव पास किया था। आरोप था कि उसके रेस्टोरेंट से शोर-शराबा होता था और इससे खासकर सोसाइटी में रहने वाले स्कूली बच्चों को परेशानी हो रही थी। मामले में कोर्ट ने बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि सोसाइटी के पास सदस्य को बेदखल करने का कानूनी आधार नहीं था।
सिर्फ बहुमत से प्रस्ताव पास हो जाने से किसी फ्लैट मालिक को उसकी प्रॉपर्टी से नहीं निकाला जा सकता। हाउसिंग सोसाइटी की मैनेजिंग कमेटी या जनरल बॉडी के पास किसी रजिस्टर्ड ओनरशिप डीड को रद्द करने, मालिकाना हक खत्म करने या जबरन प्रॉपर्टी बिकवाने का अधिकार नहीं है।
दिल्ली हाई कोर्ट की वकील मेघा शर्मा ने मनीकंट्रोल से बातचीत में कहा कि कोई हाउसिंग सोसाइटी केवल प्रस्ताव पारित करके मालिक को अपनी प्रॉपर्टी खाली करने या बेचने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।
यहां सदस्यता और मालिकाना हक के बीच अंतर समझना जरूरी है। कोई व्यक्ति सोसाइटी में वोट देने या किसी पद पर रहने जैसे सदस्यता अधिकार खो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसके फ्लैट का मालिकाना हक भी खत्म हो जाएगा।
सोसाइटी के पास कुछ परिस्थितियों में किसी सदस्य के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार हो सकता है। सदस्यता समाप्त करने की प्रक्रिया धारा 35 और नियम 28 व 29 के तहत आती है। इसमें संबंधित सदस्य को सुनवाई का मौका देना, आम सभा में तीन-चौथाई बहुमत हासिल करना और रजिस्ट्रार की पुष्टि जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं।
हालांकि, सदस्यता खत्म होना अपने आप फ्लैट का मालिकाना हक खत्म होने के बराबर नहीं है। प्रॉपर्टी पर कब्जा लेने के लिए सोसाइटी को अलग कानूनी आधार और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा।
किसी प्रस्ताव के जरिए सोसाइटी किसी फ्लैट मालिक को अपनी प्रॉपर्टी बेचने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट के वकील अमृतराज कौशल ने ईटी से बातचीत में कहा कि हाउसिंग सोसाइटी की मैनेजिंग कमेटी ऐसा प्रस्ताव पास नहीं कर सकती, जिसके जरिए किसी व्यक्ति को अपनी ही प्रॉपर्टी खाली करने का आदेश दिया जाए।
उनके मुताबिक, कोऑपरेटिव कानून के तहत ऐसी कार्रवाई के लिए कोई प्रावधान नहीं है। यानी केवल सोसाइटी का फैसला किसी मालिक से उसका फ्लैट खाली कराने का कानूनी आधार नहीं बन जाता।
जरूरी नहीं। सदस्यता समाप्त होना और फ्लैट का मालिकाना हक दो अलग कानूनी मुद्दे हैं। स्थिति इस बात पर भी निर्भर करती है कि संबंधित व्यक्ति फ्लैट का मालिक है या सिर्फ कोऑपरेटिव हाउसिंग व्यवस्था में सदस्यता के आधार पर वहां रह रहा है।
लेगम सोलिस के संस्थापक शशांक अग्रवाल ने मनीकंट्रोल से बातचीत में कहा कि आमतौर पर सदस्यता खत्म होने से फ्लैट का मालिकाना हक समाप्त नहीं होता। अगर सोसाइटी को फ्लैट पर कब्जा चाहिए तो उसे इसके लिए स्वतंत्र कानूनी आधार साबित करना होगा और निर्धारित कानूनी या अदालती प्रक्रिया अपनानी होगी।
हाउसिंग सोसाइटी के पास अनुशासनात्मक अधिकार जरूर होते हैं। खासकर लगातार परेशानी पैदा करने, प्रॉपर्टी के गलत इस्तेमाल, बिना अनुमति व्यावसायिक गतिविधि चलाने या वैध बकाया राशि का भुगतान न करने जैसे मामलों में सोसाइटी अपने नियमों के तहत कार्रवाई कर सकती है।
लेकिन इन अधिकारों का मतलब यह नहीं है कि सोसाइटी सीधे मालिकाना हक खत्म कर सकती है, फ्लैट बेचने के लिए मजबूर कर सकती है या किसी मालिक को जबरदस्ती घर से बाहर निकाल सकती है।
अगर किसी फ्लैट मालिक के खिलाफ सोसाइटी प्रस्ताव पास करती है तो वह कानूनी सलाह लेकर सोसाइटी की कमेटी को नोटिस भेज सकता है और प्रस्ताव की वैधता को चुनौती दे सकता है। इसके अलावा रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसाइटीज या डिप्टी रजिस्ट्रार के सामने भी शिकायत या याचिका दाखिल की जा सकती है।
अगर मैनेजमेंट कमेटी जबरदस्ती कार्रवाई करने, शारीरिक रूप से रोकने या जरूरी सेवाएं बंद करने की धमकी देती है तो मालिक सिविल कोर्ट में अस्थायी या स्थायी रोक की मांग कर सकता है। परेशान करने, आपराधिक धमकी देने या गलत तरीके से रोकने जैसी स्थिति में भारतीय न्याय संहिता के तहत पुलिस में शिकायत भी की जा सकती है।
किसी फ्लैट मालिक को घर छोड़ने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से सोसाइटी या रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन पानी और बिजली जैसी बुनियादी सेवाएं बंद नहीं कर सकती। बकाया भुगतान या किसी विवाद के चलते भी किसी मालिक को जबरन उसकी प्रॉपर्टी से निकालने का अधिकार सोसाइटी के पास नहीं है।
पानी, प्लंबिंग और मुख्य बिजली लाइनों जैसी जरूरी सुविधाएं काटना आम तौर पर गैरकानूनी माना जाता है, भले ही मेंटेनेंस फीस बकाया हो। हालांकि, सोसाइटी के पंजीकृत नियमों में अनुमति होने पर जिम, क्लब हाउस या स्विमिंग पूल जैसी गैर-जरूरी मनोरंजन सुविधाओं के इस्तेमाल पर रोक लगाई जा सकती है।
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