नई दिल्ली: दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के सामान्य रूप से संचालन की उम्मीद ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को राहत दी है। यदि आने वाले समय में यह मार्ग पूरी तरह खुला रहता है और ईरान-अमेरिका के बीच शांति बनी रहती है, तो इसका सीधा असर भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर दिखाई दे सकता है। इसका फायदा केवल सरकार या तेल कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, हवाई किराए और रोजमर्रा के खर्च तक महसूस किया जा सकता है।
दुनिया की ऑयल लाइफलाइन क्यों माना जाता है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?
भौगोलिक रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ईरान और ओमान के बीच मौजूद एक संकरा समुद्री मार्ग है, जो पर्शियन गल्फ को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। इसकी चौड़ाई करीब 33 किलोमीटर है, लेकिन वैश्विक तेल व्यापार में इसकी भूमिका बेहद बड़ी मानी जाती है। समुद्री रास्ते से होने वाले दुनिया के कुल कच्चे तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है।
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, कुवैत, ईरान और कतर जैसे बड़े तेल और गैस उत्पादक देश अपने निर्यात के लिए इसी मार्ग पर निर्भर हैं। यही वजह है कि इस क्षेत्र में किसी भी तरह के तनाव या संघर्ष का असर तुरंत अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई देता है। ऐसे में मार्ग के सामान्य होने से वैश्विक बाजारों में राहत का माहौल बना है।
विदेशी तेल पर भारत की बड़ी निर्भरता
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। देश दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ताओं और आयातकों में शामिल है। भारत के कुल तेल आयात का लगभग 60 से 65 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों से आता है।
सिर्फ पेट्रोल और डीजल ही नहीं, बल्कि घरेलू रसोई गैस की जरूरत का भी बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। इनमें से काफी मात्रा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचती है। पहले तनाव की स्थिति में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने, डिलीवरी में देरी और अतिरिक्त बीमा लागत के कारण भारत का आयात खर्च बढ़ जाता था। मार्ग सुचारू रहने पर यह दबाव कम हो सकता है।
क्या सस्ती हो सकती है रसोई गैस?
देश के करोड़ों परिवारों के घरेलू बजट में एलपीजी की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी होती है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल और गैस की आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो एलपीजी की लागत पर भी असर पड़ सकता है।
सप्लाई चेन मजबूत होने और लॉजिस्टिक खर्च घटने की स्थिति में तेल विपणन कंपनियों की लागत कम हो सकती है। इसका असर आगे चलकर घरेलू और व्यावसायिक गैस सिलेंडर की कीमतों में स्थिरता के रूप में दिख सकता है। साथ ही समय पर आपूर्ति सुनिश्चित होने की संभावना भी बढ़ेगी।
पेट्रोल-डीजल के दाम पर कितना असर पड़ेगा?
अमेरिका-ईरान शांति समझौते की घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में नरमी का रुख देखा गया। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए कच्चे तेल की कीमतों में मामूली गिरावट भी आयात बिल पर बड़ा असर डालती है।
यदि तेल कंपनियों को सस्ता कच्चा तेल उपलब्ध होता है, तो घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। इससे रोजाना निजी वाहन इस्तेमाल करने वाले लोगों को राहत मिल सकती है।
इसके साथ ही डीजल की लागत घटने पर माल ढुलाई सस्ती हो सकती है, जिसका असर फल, सब्जियां, अनाज और रोजमर्रा के उपभोक्ता सामानों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था को कैसे मिल सकता है फायदा?
आर्थिक स्तर पर देखें तो तेल कीमतों में स्थिरता भारत के व्यापार घाटे को कम करने में मददगार साबित हो सकती है। देश के विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा ऊर्जा आयात पर खर्च होता है।
यदि कच्चा तेल अपेक्षाकृत सस्ता और स्थिर रहता है, तो सरकार पर वित्तीय दबाव कम हो सकता है। साथ ही राजकोषीय संतुलन बेहतर होने और रुपये को डॉलर के मुकाबले मजबूती मिलने की संभावना भी बढ़ सकती है।
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