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नेपाल में आखिर कैसे आई महाप्रलयकारी बाढ़? ISRO और अमेरिका की रिपोर्ट में बड़ा अंतर, भूकंप पर छिड़ी बहस

नई दिल्ली: नेपाल के रसुवा जिले और नेपाल-चीन सीमा से लगे इलाकों में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचा दी है। इस प्राकृतिक आपदा में 150 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जबकि कई इलाकों में सड़क, पुल और दूसरी बुनियादी सुविधाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। अब इस महाप्रलय की वजह को लेकर अलग-अलग वैज्ञानिक आकलन सामने आए हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन से जुड़े वैज्ञानिकों ने भूकंप के बाद ग्लेशियर टूटने की आशंका जताई है, जबकि अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने भूकंप की संभावना को खारिज किया है।

आपदा की शुरुआत आखिर किस घटना से हुई, इसे लेकर वैज्ञानिकों के बीच अभी पूरी तरह सहमति नहीं बनी है। एक आकलन में भूकंप के झटकों के बाद ग्लेशियर के अस्थिर होने की बात सामने आई है, तो दूसरे अध्ययन के मुताबिक बर्फ, चट्टानों और मलबे के अचानक खिसकने से पैदा हुए कंपन को भूकंप समझ लिया गया।

भूकंप के बाद ग्लेशियर टूटने का अनुमान

हैदराबाद स्थित इसरो की शाखा राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र ने उपग्रह से मिले आंकड़ों के आधार पर इस आपदा का शुरुआती अध्ययन किया है। इसके लिए यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-2 और भारत के रिसोर्ससैट-2ए उपग्रहों से ली गई बाढ़ से पहले और बाद की तस्वीरों का अध्ययन किया गया।

भारत के राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक, नेपाल-तिब्बत सीमा के पास रसुवा क्षेत्र में सुबह करीब 10 किलोमीटर की गहराई पर 4.9 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया था।

राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र के शुरुआती आकलन के मुताबिक, तिब्बत के ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाके में मौजूद एक कटोरानुमा ग्लेशियर भूकंपीय हलचल के बाद अस्थिर हुआ हो सकता है। इसके बाद बर्फ और मलबे का विशाल हिस्सा तेजी से घाटी की ओर नीचे आया।

मलबे के इस तेज बहाव ने कुछ समय के लिए नदी का रास्ता रोक दिया और वहां एक अस्थायी बांध जैसा बन गया। जब यह अवरोध टूटा तो पानी के साथ कीचड़, पत्थर और भारी मलबा तेज रफ्तार से नीचे की ओर बह निकला। इस सैलाब ने त्रिशूली नदी के रास्ते में आने वाले निचले इलाकों में भारी तबाही मचा दी।

अमेरिकी एजेंसी ने भूकंप की बात नकारी

दूसरी ओर, अमेरिका स्थित यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे ने शुरुआती भूकंप के आकलन से अलग राय रखी है। अमेरिकी एजेंसी का कहना है कि आपदा के दौरान वहां कोई वास्तविक भूकंप नहीं आया था।

USGS के अनुसार, काठमांडू के उत्तर में नेपाल-चीन सीमा के पास जिस 4.4 या 5.2 तीव्रता की भूकंपीय गतिविधि का शुरुआती अनुमान लगाया गया था, वह धरती की भूगर्भीय प्लेटों की हलचल नहीं थी। एजेंसी का मानना है कि भारी मात्रा में बर्फ, चट्टानों और मलबे के अचानक नीचे गिरने से पैदा हुए कंपन को उपकरणों ने भूकंप के रूप में दर्ज किया।

20 किलोमीटर दूर हुआ था बड़ा भूस्खलन

प्लैनेट लैब्स के उपग्रह से ली गई तस्वीरों के विश्लेषण के आधार पर USGS ने बताया कि रसुवागढ़ी सीमा से करीब 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में नदी के जलग्रहण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बर्फ और चट्टानों का अचानक भूस्खलन हुआ।

यह इलाका ल्हेन्डे नदी के जलग्रहण क्षेत्र में आता है। ल्हेन्डे नदी भोटे कोशी की सहायक नदी है। अमेरिकी आकलन के मुताबिक, बर्फ, चट्टानों और मलबे के इस बड़े हिस्से के खिसकने के बाद पानी और मलबा मिलकर देखते ही देखते विशाल सैलाब में बदल गया।

मलबे से पैदा हुए झटके को 5.2 तीव्रता जैसा दर्ज किया गया

USGS का कहना है कि मलबे के इस बड़े पैमाने पर खिसकने की ताकत इतनी ज्यादा थी कि इससे पैदा हुए झटके 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर दर्ज हुए। यही वजह बताई जा रही है कि शुरुआती स्तर पर इस घटना को भूकंप से जोड़कर देखा गया।

हालांकि, वैज्ञानिक अभी भी इस आपदा के वास्तविक ट्रिगर को लेकर विस्तृत जानकारी जुटा रहे हैं। अलग-अलग उपग्रह तस्वीरों और भूकंपीय आंकड़ों के अध्ययन के बाद ही घटना की पूरी तस्वीर और स्पष्ट हो सकेगी।

नेपाल की तबाही पूरे दक्षिण एशिया के लिए चेतावनी

भारतीय विशेषज्ञों के मुताबिक, इस आपदा का केंद्र भारतीय सीमा से 200 किलोमीटर से अधिक दूरी पर था। इसके बावजूद इतनी दूर हुई इस घटना का असर सीमावर्ती इलाकों और नदी तंत्र पर दिखाई दे सकता है। वैज्ञानिकों के लिए भी यह घटना हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ के बढ़ते खतरे को समझने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

vineet verma

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