ईरान-अमेरिका तनाव के बीच दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप है। लाल सागर में भी हूतियों की गतिविधियां बढ़ रही हैं। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वैसी तेजी नहीं दिख रही, जैसी किसी बड़े सप्लाई संकट के दौरान आमतौर पर देखने को मिलती है। आखिर इसकी वजह क्या है?
होर्मुज स्ट्रेट को वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की लाइफलाइन माना जाता है। इस रास्ते से दुनिया के तेल कारोबार का करीब पांचवां हिस्सा गुजरता है। Kpler के शिपिंग डेटा के मुताबिक रविवार को होर्मुज से एक भी जहाज नहीं गुजर सका, जबकि शनिवार को केवल पांच कमोडिटी जहाजों ने इस जलमार्ग को पार किया था।
इससे पहले के वीकेंड में 31 जहाजों ने होर्मुज को पार किया था। यानी कुछ ही दिनों में इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर शिपिंग गतिविधियों में बड़ी गिरावट आई है।
ईरान का कहना है कि होर्मुज में सामान्य शिपिंग तभी बहाल होगी, जब अमेरिका उसकी शर्तों को स्वीकार करेगा। ऐसे में अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत में स्पष्ट सहमति नहीं बनना वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए चिंता बढ़ा रहा है।
इतने बड़े भू-राजनीतिक संकट के बावजूद कच्चे तेल की कीमतों में बेकाबू तेजी नहीं आना बाजार के लिए सबसे बड़ा सवाल है। 17 अगस्त को ब्रेंट क्रूड करीब 0.55 डॉलर बढ़कर 89.14 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। वहीं WTI क्रूड करीब 0.36 डॉलर की बढ़त के साथ 82.67 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा।
यानी कीमतें बढ़ रही हैं, लेकिन फिलहाल बाजार में उस तरह की घबराहट नहीं है, जो होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के लंबे समय तक बंद रहने की स्थिति में अपेक्षित होती है।
1. वैकल्पिक सप्लाई रूट पर बढ़ी निर्भरता
होर्मुज में जोखिम बढ़ने के बाद तेल कारोबारी और आयातक दूसरे समुद्री मार्गों और वैकल्पिक सप्लाई चैन का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। इससे एक ही जलमार्ग पर निर्भरता कुछ कम हुई है।
2. देशों ने तैयार किया सप्लाई बफर
लंबे समय से जारी संकट को देखते हुए कई देशों और कंपनियों ने रणनीतिक भंडार और वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था पर काम किया है। इससे अचानक पैदा हुई कमी का असर सीमित करने में मदद मिल रही है।
3. ऊर्जा के दूसरे विकल्पों का विस्तार
इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर ऊर्जा और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। भारत जैसे देशों में E20 जैसे ईंधन विकल्प भी पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
4. बाजार ने युद्ध के जोखिम को काफी हद तक कीमत में शामिल किया
कई महीनों से जारी तनाव के कारण ट्रेडर्स पहले ही संभावित सप्लाई व्यवधान को लेकर अपनी रणनीति बदल चुके हैं। इसलिए हर नए घटनाक्रम पर तेल की कीमतों में उसी अनुपात में उछाल नहीं आ रहा है।
होर्मुज के साथ लाल सागर में भी तनाव बढ़ रहा है। यमन के हूती समूह की गतिविधियों ने बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है।
Kpler के आंकड़ों के अनुसार, इस सप्ताह बाब-अल-मंदेब से 49 जहाज गुजरे, जबकि पिछले सप्ताह यह संख्या 55 थी। शिपिंग गतिविधियों में यह गिरावट बताती है कि कारोबारी लाल सागर के रास्ते को लेकर भी सतर्क हैं।
फिलहाल बाजार वैकल्पिक सप्लाई, स्टॉक और दूसरे ऊर्जा विकल्पों के सहारे स्थिति संभाल रहा है। लेकिन अगर होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक पूरी तरह बंद रहता है और तेल की वास्तविक सप्लाई में बड़ी कमी आती है, तो तस्वीर तेजी से बदल सकती है।
ऐसी स्थिति में एशिया के बड़े तेल आयातक देशों पर दबाव बढ़ सकता है, शिपिंग और इंश्योरेंस लागत बढ़ सकती है और अंततः इसका असर पेट्रोल-डीजल समेत वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर पड़ सकता है।
होर्मुज में शिपिंग संकट और लाल सागर में बढ़ता तनाव फिलहाल तेल बाजार को हिला जरूर रहा है, लेकिन वैकल्पिक सप्लाई रूट, बफर स्टॉक और ऊर्जा के दूसरे विकल्पों ने कीमतों में तत्काल बेकाबू उछाल को रोक रखा है। हालांकि, होर्मुज का संकट जितना लंबा खिंचेगा, वैश्विक तेल बाजार के लिए जोखिम उतना ही बढ़ता जाएगा।
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