नई दिल्ली। संसद के मॉनसून सत्र में जारी गतिरोध खत्म करने के लिए केंद्र सरकार ने कोशिशें तेज कर दी हैं, लेकिन विपक्ष के रुख से टकराव कम होता नहीं दिख रहा। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात कर सदन चलाने में सहयोग मांगा, लेकिन बातचीत के बाद भी गतिरोध बरकरार है।
परिसीमन बिल को लेकर राष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के अनुसार, DMK इस अहम विधेयक पर केंद्र सरकार का समर्थन कर सकती है, जिससे संसद में सरकार की राह आसान हो सकती है।
इसी बीच सियासी बयानबाज़ी भी तेज हो गई है। DMK से जुड़े हलकों में यह संदेश दिया जा रहा है कि करीब दो दशक पुराने गठबंधन को कांग्रेस ने सत्ता के समीकरणों के चलते कमजोर किया। ऐसे में अब DMK का बदला हुआ रुख कांग्रेस के लिए राजनीतिक तौर पर झटका साबित हो सकता है।
हालांकि, आधिकारिक तौर पर DMK की तरफ से कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की गई है, लेकिन परिसीमन बिल पर उसका संभावित समर्थन आने वाले दिनों में संसद की राजनीति को नया मोड़ दे सकता है।
सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी ने साफ कर दिया कि गृह मंत्री अमित शाह के बयान के बिना सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से नहीं चल सकती। विपक्ष की मांग है कि चंदा चोरी और छात्रों पर पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों पर सरकार जवाब दे। ऐसे में सरकार और विपक्ष के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है।
करीब 50 मिनट चली इस अहम बैठक में प्रियंका गांधी भी मौजूद रहीं। बैठक में संसद के गतिरोध के अलावा सरकार के प्रमुख विधायी एजेंडे परिसीमन बिल और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन पर भी चर्चा हुई। सरकार इन विधेयकों को पास कराने के लिए विपक्ष का समर्थन चाहती है, लेकिन मौजूदा माहौल में यह आसान नहीं दिख रहा।
दरअसल, संसद का मॉनसून सत्र पिछले एक हफ्ते से ज्यादा समय से हंगामे की भेंट चढ़ा हुआ है। नीट पेपर लीक पर शुरुआती चर्चा के बाद दोनों सदनों की कार्यवाही लगातार बाधित रही है। इस बीच सरकार कुछ महत्वपूर्ण विधेयक शोर-शराबे के बीच पास करा चुकी है, जिससे विपक्ष और आक्रामक हो गया है।
राजनीतिक तौर पर देखें तो सरकार के सामने अब रणनीतिक विकल्प मौजूद हैं। वह या तो विपक्ष को साथ लेकर सत्र के अंतिम दिनों में परिसीमन बिल पेश करे, या फिर मॉनसून सत्र को 15 अगस्त के बाद तक बढ़ाने पर विचार करे। यह बिल बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसमें लोकसभा और विधानसभा सीटों में 50 फीसदी तक बढ़ोतरी और अगले आम चुनाव से 33 फीसदी महिला आरक्षण लागू करने का प्रावधान है।
दिलचस्प यह भी है कि पिछले कुछ महीनों में राजनीतिक समीकरण बदले हैं। कुछ विपक्षी दलों के रुख में नरमी के संकेत हैं और सरकार को उम्मीद है कि वह आवश्यक समर्थन जुटा सकती है। सूत्रों का कहना है कि यदि सीटों की संख्या बढ़ाने को लेकर स्पष्ट प्रावधान किया जाता है, तो कुछ क्षेत्रीय दल इस बिल के समर्थन में आ सकते हैं।
हालांकि विपक्ष अब भी आशंकित है कि परिसीमन से दक्षिण और छोटे राज्यों की हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि वह पहले सरकार से जवाबदेही तय करना चाहता है, उसके बाद ही विधायी सहयोग पर विचार करेगा।
सत्र के आखिरी दिनों में परिसीमन बिल के साथ-साथ एफसीआरए संशोधन विधेयक पर भी सबकी नजरें टिकी हैं। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार राजनीतिक सहमति बना पाती है या फिर संसद का गतिरोध आगे भी जारी रहता है।
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