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सरकार का बड़ा ‘रूल अपडेट’: अब सिर्फ 2.5% शेयर बेचकर भी मार्केट में लिस्ट हो सकेंगी बड़ी कंपनियां, Jio और NSE को मिलेगा बड़ा फायदा

भारतीय टेक और फाइनेंस की दुनिया में हलचल तेज है , इंडियन टेक-इकोसिस्टम और में इस वक्त सिर्फ एक ही चर्चा है वो है ‘The Great Relaxation’। भारत सरकार ने Minimum Public Shareholding (MPS) के पुराने घिसे-पिटे नियमों को ‘अपडेट’ कर दिया है। इसे Jio और NSE जैसे हैवीवेट्स के लिए एक “VIP एग्जिट पास” समझ सकते हैं।

क्या है पूरा मामला?


किसी भी कंपनी को शेयर बाजार के ‘क्लब’ में शामिल होने के लिए अपनी ओनरशिप का एक हिस्सा पब्लिक को बेचना पड़ता है। अब तक के रूल्स इतने सख्त थे कि बड़ी टेक कंपनियों को अपना बहुत सारा कंट्रोल एक बार में ही छोड़ना पड़ता था। इससे मार्केट में ‘Liquidity Shock’ का डर बना रहता था। लेकिन अब, वित्त मंत्रालय ने ‘स्मॉल स्टार्ट, बिग स्केल’ का बटन दबा दिया है।

नए नियमों का “टेक-चेक”


रिलायंस जियो जैसे बड़े दिग्गज टेक, जिनकी वैल्यूएशन आसमान छू रही है, अब वो सिर्फ मात्र 2.5% हिस्सेदारी के साथ मार्केट में ‘डेब्यू’ कर सकते हैं। पहले ये 5% का हार्ड-लिमिट था, जो इन बड़ी कंपनियों के लिए किसी सिरदर्द से कम नहीं था।

लिस्टिंग के बाद 25% पब्लिक शेयरहोल्डिंग तक पहुँचने के लिए कंपनियों को 10 साल का लंबा ‘कूलिंग पीरियड’ दिया गया है। इसका मतलब है की फाउंडर्स के पास विजन पर काम करने के लिए ज्यादा समय और कंट्रोल बेचने का कम प्रेशर।

Jio और NSE के लिए यह ‘मास्टरस्ट्रोक’ क्यों है?


रिलायंस जियो अब सिर्फ एक सिम कार्ड कंपनी नहीं, बल्कि एक AI और डिजिटल ईकोसिस्टम है। कम शेयर बेचकर लिस्ट होने का मतलब है कि मुकेश अंबानी कंपनी की स्ट्रैटेजिक कंट्रोल अपने हाथ में रख पाएंगे और ग्लोबल इन्वेस्टर्स से भारी फंड भी उठा लेंगे।

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) सालों से रेगुलेटरी बाधाओं में फंसा था। इस नए नियम ने उन सभी तकनीकी रुकावटों को ‘डिलीट’ कर दिया है। अब 2026 तक NSE की लिस्टिंग लगभग कन्फर्म लग रही है।

अगर जियो या NSE अपनी 10% हिस्सेदारी एक साथ मार्केट में उतार देते, तो मार्केट का सारा कैश एक ही तरफ खिंच जाता। यह नया 2.5% वाला फॉर्मूला मार्केट में बिना किसी ‘सिस्टम क्रैश’ के बड़े IPOs को एब्जॉर्ब करने की ताकत देता है।

टेक एक्सपर्ट्स की राय


टेक-एनालिस्ट्स इसे भारतीय स्टार्टअप्स के लिए ‘ग्रीन सिग्नल’ मान रहे हैं। Flipkart और Swiggy जैसी बड़ी कंपनियाँ, जो अब तक विदेशी बाजारों की ओर देखती थीं, अब भारतीय बाजारों में अपनी वैल्यूएशन का सही दाम लगा पाएंगी। यह ‘मेक इन इंडिया’ का फाइनेंस वर्जन है।

टेक एक्सपर्ट्स का ये भी कहना है की यह सिर्फ एक पॉलिसी चेंज नहीं, बल्कि भारत को ग्लोबल ‘IPO कैपिटल’ बनाने के लिए एक ‘सॉफ्टवेयर अपडेट’ है। 2026 तक हम ऐसे मेगा-लिस्टिंग्स देखेंगे जो भारतीय शेयर बाजार के इतिहास को हमेशा के लिए बदल देंगे।

news desk

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