चुनाव आयोग के कामकाज और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रहे विवाद के बीच डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी (DPAP) के अध्यक्ष गुलाम नबी आजाद ने चुनावों की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठाए हैं। 27 सितंबर 2026 को अनंतनाग में पत्रकारों से बातचीत के दौरान आजाद ने कहा कि पहले राजनीतिक दल चुनाव आयोग पर आरोप लगाते थे, लेकिन उनके पास आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं होते थे। अब स्थिति इसलिए अलग है क्योंकि दो चुनाव आयुक्तों की ओर से आयोग के भीतर आपत्तियां दर्ज किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
गुलाम नबी आजाद ने कहा कि मौजूदा विवाद में दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के सामने कई बार अपनी चिंताएं रखीं। उन्होंने सवाल किया कि अगर आयोग के तीन सदस्यों में से दो किसी फैसले या प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं, तो इसे गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
आजाद की टिप्पणी उस रिपोर्ट के बाद आई है, जिसमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज किए जाने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ये आपत्तियां मतदाता पंजीकरण, नाम जोड़ने और हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव तथा मतदाता डेटा के प्रबंधन जैसे मुद्दों से जुड़ी थीं।
DPAP अध्यक्ष ने कहा कि अगर मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर ही गंभीर सवाल उठते हैं, तो उस सूची के आधार पर कराए गए चुनावों को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
उन्होंने सवाल किया कि अगर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए और बाद में उन्हीं मतदाता सूचियों के आधार पर चुनाव कराए गए, तो ऐसी स्थिति में चुनावों की वैधता पर किस तरह विचार किया जाना चाहिए।
आजाद ने विपक्ष की ओर से दोबारा चुनाव कराने जैसी मांगों को भी इसी संदर्भ में रखा और कहा कि दो चुनाव आयुक्तों की ओर से उठाई गई आपत्तियों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच संधू और जोशी ने आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ आपत्तियां एक ही दिन में दर्ज की गई थीं।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची से जुड़े डेटा के इस्तेमाल, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और फॉर्म-6 में किए गए बदलाव जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए थे। मतदाता डेटा और तकनीकी व्यवस्था के केंद्रीकरण को लेकर भी आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात सामने आई।
इन रिपोर्टों के बाद चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेद की तस्वीर को खारिज करते हुए कहा कि SIR समेत आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग के अनुसार, बहुसदस्यीय संस्था में अलग-अलग राय, सवाल और सुझाव निर्णय लेने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
आयोग की ओर से यह भी कहा गया कि संधू और जोशी ने मतदाता सूची से नाम हटाने और डेटा प्रबंधन से जुड़े कुछ मुद्दों पर चिंताएं जरूर उठाईं, लेकिन अंतिम फैसलों पर तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति थी।
चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दल पहले से सवाल उठाते रहे हैं। इसी बीच आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों की रिपोर्ट ने विवाद को एक नया आयाम दे दिया है।
अब गुलाम नबी आजाद के बयान के बाद बहस सिर्फ SIR की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि मतदाता सूची में बदलाव के बाद हुए या होने वाले चुनावों की विश्वसनीयता और प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को सर्वसम्मत बताया है और फिलहाल किसी चुनाव को रद्द करने या दोबारा कराने का कोई आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है।
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